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________________ महाराधना कालके दीक्षित भी महिलापा विजयोनेसे दोपयुत्त माने जाते हैं. अपयशके पात्र होते हैं. आवास १११५ aaaaxnacscinemama a किं पुण तरुणा अबहुस्सूदा य सइरा य विगदबेसा य । महिलासंसमगीए णट्ठा अचिरेण होहति ।। १.९९ ।। किं पुनर्विकृताकल्पाः स्वैरिणः शेषसाधयः ।। नारीसंसर्गसो नष्टा न सति स्वल्पकालतः ।। ११३४ ।। विजयोदया-कि पुण सरणा सयौबनाः, अबधुताः, स्वैरचारिणः, धिकृतवेषाच युवतिसंसर्गेण झटिति नण न भवन्ति ? किं पुनर्भवन्त्येवेति याचन् । तदेव सविस्मययक्रमणित्या भणति----- मूलारा-सइरा खैराः स्वच्छंदचारिणः । बिगदवसा विकृतयपाः । देशकुलपयोवर्णविद्याचरणाद्यनुचितनेपन्याः स्वानुरुपाचारच्युताः । अर्थ-जा तरुण है, अस्पन्न है, स्वराचारी है, जो देश, कुल. बय, वर्ण विद्या, आचार इत्यादिकों को ET प्रतिकूल ऐसा वेष धारण करते हैं. ऐसे मनुष्य स्त्रीसमर्मस क्यों न शीघ नष्ट होंग अर्थात् होंगे ही. अर्थात् बे लोक स्त्री संसर्गमें अकीर्तिमान होंगे इसमें क्या आश्चर्य है. ma । साडो हु जइणिगाए संसग्गीए टु चरणपब्मट्टो ।। गाणियासंबग्गीए य कुववारी तहा हो ॥ ११००॥ जनिकासंगतो नष्टश्चरणाच्छकटी यतिः ।। वेश्यायाः सह संसर्गानष्टः कूपवरस्तथा ॥ १.३५ ।। दिगोदया-गो दुसगडागागधेयः । जणिगार समागीण जाणिगासंज्ञाया: संसर्गेण । चरणपभट्ठो चारित्राझष्टः । गणिकासंसगीप गांगकागोष्ठया कूवरो वि कूपारनामकः | तहाणटो तथा चारित्रानष्टः।। स्त्रीसमें पूर्वेषामपि संयमभ्रशं गाशवन पर्शयति--- १११४ -
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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