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मूलाराधना
आश्वासः
अपवित्रस्थानमें स्वल्प कालतक रहा हुआ मनुष्य भी जुगुप्सा योग्य माना जाता है तो चिरकाल यहां रहा हुआ क्यों जुगुप्सा योग्य नहीं माना जायगा? इस प्रश्नका उत्तर
अर्थ--वान्ति और विष्ठांक बीचमें अपना कोई संबंधी मनुष्य एक मासतकभी रहा हुआ अपने प्रत्यक्ष हुआ तो हम उसकी ग्लानि करते ही है. यद्यपि यह हमारा स्वजन भी हो तो भी उसकी ग्लानि हमारे मनम होगी ही.
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किह पुण णवदसमासे उसिदो वमिगा अमेझमज्झम्नि ।
होज्जम विहिंसणिज्जो जदि वि हु णीयल्लओ होज्ज १०१४॥ विजयोदया-किड पुण कथं पुनः । न होज्ज्ञ विसिणिज्जो न भवेज्जुगुप्सनीयः । जबदसमास उसिदो नवमासं दशमासं वावस्थितः । वमिगा अमेज्सममम्मि मात्रा उपयुक्त आहारो वमिगाशब्देनोच्यते 1 शेषः सुगमः ।। खि गर्द ॥
मूलारा.....किध-उसियो स्थितः । मिग़ा जनन्योपयुक्त आहारः । क्षेत्रम् ॥ . .
अर्थ-तो जिसने गर्भ में नउ दस महिनेतक निवास किया है और माताका भक्षण किया हुआ आहार खाकर जो वृद्धिको प्राप्त हुआ है वह क्यों न ग्लानिका पात्र बनेगा ? अर्थात् वह अवश्य घृणाका पात्र है.
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येनाहारणासायुपचितशरीरो जातस्तमाच -
दंतेहिं चव्विदं वीलणं च सिमेण मेलिद संतं ।। मायाहारियमण्णं जुत्तं पित्तेण कडुएण || १०१५ ।। पिच्छिलं चर्वित दन्ममिश्रितं संप्मणा च यत् ।।
अनं मात्रशितं युतं पित्तन कटुकात्मना । १.४२ ।। विजयोदया-दंतेहि चन्विदं दंतेश्चूर्णितं । बीलणं पिच्छिल । कथं, सिमेण मेलिदं श्लेष्मणा मिश्रित सत् । मावाहारिदमणं मात्रा भुक्तमझ । कडपण पित्तेण जुत्तं कटुकेन पित्तेन जुलै ॥
येनाहारेणोपचितशरीरो नरः संपन्नस्तं गाथापंचकेन व्याचष्टे--
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