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________________ मुलाराधना आश्वास: मूलारा-पष्टम् ॥ - अर्थ-परखी सेवन जिसने पूर्व जन्ममें किया था उसकी पत्नी, बहिन, माता और लडकी लक्षावधि जन्मामें अपकीर्ति करनेवाली, दुःख देनेवाली और हमेशा व्यभिचारिणी हो जाती है. १०२३ होइ सयं पि विसीलो पुरिसो अदिदुब्भगो परभवेसु ॥ पावइ वधबंधादि कलह णिच्च अदोसो वि ॥ ९३६ ॥ विशीलो दुर्भगोमुत्र जायत पारदारिकः ।। निदोषोऽप्यनुते यंध संक्शं कलहं वधम् ॥ ५५० ।। विजयोदया-ठोवि स पि भवति स्वयमपि विशीलः, पुरूपी धर्मगच प्रामीति नित्यं च वधधं आना सकलहं च दोषोऽपि। परस्त्रीभाजो विशीलभावादिलाभमाह-- मूलारा स्पष्टम् ।। . अर्थ- वह परदारसेवी पुरुष भी विशील-शीलवत रहित होता है और करूप होता है. निदोष होनेपर भी वध, बंध कलह इत्यादि दुःखोंको वह प्राप्त होता है. : R ASATARATAFATAR इहलोए वि महल्लं दोसं कामरस वसगदो पत्तो ।। कालगो विय पच्छा कडारपिंगो गदो गिरयं ।। ९३५ ॥ महान्तं दोषमासाद्य भवेऽप्र स्मरमोहितः ॥ मृत्वा कहारपिंगोऽगाच्छ्वनं दुःसहवेदनम ।। ९५१ ।। विजयोदया-इहलोए वि महल कहार पंगो इहलोकेऽपि महान्तं दोषं प्रातः कामवशंगतः । कालं त्या पश्चान्नरकेषु प्रविष्टः | चाच्यमत्रापानकम् ॥ उक्तमेवार्थमाख्यानेन यापयन्नाह - OM १८०३
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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