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________________ मूलाराधना ! १००८ और अनंत संसारकी वृद्धि इन बातोंको वह जानताही नहीं अर्थात् मैं विषयलंपटी बनने से मेरी बुरी हालत बनेगी. मेरेको संसारमें अनंतकालतक दुर्गति धारण कर अपकीर्ति के साथ भ्रमण करना पडेगा इन बातोंका वह विचार ही नहीं करता है. णीच पि विसयहेतुं संवाद उच्चो वि विसयलुद्धमदी || बहुगं पिय अवमाणं विसयंधो सहइ माणीवि ॥ ९०८ ॥ उवोऽपि सेवते नीचं विषयाभिषकांक्षया ॥ स्मरातः सहते वज्ञां मानवानपि मानवः ॥ ९२२ ॥। विजयोदय - णी पि बिसयहेतुं ज्ञानकुलादिभिरतीय न्यूनमपि सेवते कुलीनो बुद्धिमानपि विषय लुध्धमतिः । परिभवं महांतमपि धनिभिः क्रियमाणं सहते विषयांधः ॥ मूलारा – अवमाणं धनिभिः क्रियमाणं पराभवं । माणी वि मानवानपि । अर्थ -- विषयसेवनके लिए वह उच्चकुलीन और बुद्धिमान होकर भी विषयमें लुब्ध होकर ज्ञान, जाति और कुलादिसे हीन ऐसे नीच पुरुषोंकी सेवा करता है तथा उसका माना स्वभाव होते हुए भी वह विषयां नसे किये गये अनेक अपमानोंको और धनिजोसे किये गये अपमानों को सहता है. पि कुदि कम्मं कुलपुत्तदुगुछियं विगदमाणो || वातिओ विकम्मं अकासि जह लांघियाहेदुं ॥ ९०९ ॥ कुलीनो निंदितं कर्म कुरुते विषयाशया ॥ जिवृक्षुकों वृत्तं चारित्रं त्यक्तवान्न किं ॥ ९२३ ॥ विजयोदयाप कुणदि नीचमपि करोति कर्म उभिएभोजनादिकं कुलीननिदितं विनाभिमानः । वारतिगो नाम यतिरतिगर्हितं कर्म कृतवान् यथा कुलीनः स्त्रीनिमित्तं ॥ मूल्यराणी भोजनादिकं । वारतओ वारत्रको नाम यतिः । अकासि अकार्षीन् कृतवान् । विवाहेतुं नर्तकीनिमित्तम । " आवारा ६ २००८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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