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________________ अनुशिष्टि महाधिकार [ ४५१ पिब सम्यक्त्व पीयूषं मिथ्यात्व विष मुत्सृज । निघेहि भक्तिश्चित्ते नमस्कार मनारतम् ।।७५३।। इन्हीं कारिकाओंके विश्लेषण रूप आगेका संपूर्ण उपदेश है अर्थात् उपधि तथा आहारको निर्दोष ग्रहण करना । शल्यका त्याग, मिथ्यात्वका वमन, सम्यक्त्वको भावना, भक्ति पंच नमस्कार मंत्रमें प्रीति और ज्ञानाभ्यास इनके लिये क्षपक्रको प्रेरित किया है पुनः महाव्रतोंका विस्तार पूर्वक वर्णन है । कषायका निग्रह और इन्द्रियों पर विजय करने के लिये बहुत ही सुदर रीतिसे समझाया है । अंतमें तपस्याका माहात्म्य एवं गुण तथा फल वर्णन करते हुए यह अधिकार समाप्त होता है ।
SR No.090280
Book TitleMarankandika
Original Sutra AuthorAmitgati Acharya
AuthorJinmati Mata
PublisherNandlal Mangilal Jain Nagaland
Publication Year
Total Pages749
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size17 MB
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