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________________ अध्यात्म बारहखड़ी २०५ अग्निभूति अर वायु जु भति, सालिग्राम ग्राम में मोती । 'पहिली मुनि सौं वाद अ कीनी. पाछै तेरो धर्म जु चीनौं ॥२४२।। ते दोऊ लें स्वर्ग पठाये, बनके अशुभ समस्त उठाये । 'अग्निभूति तै सप्तम भव मैं, कृष्ण पुत्र व पाये तुव मैं ॥२४॥ अग्निभूति को जीव जु मदनां, भयो प्रद्युम्न मदन जु कदनां । वायुभूति भौ शंबु कुमारा, दोऊ तुव भजि उतरे 'पारा ।।२४४।। प्रवर विष ह्व ते हूँ भैया, कोसांवी नगरी जु वसया । जेठी बन मै अनि जु भूती, बहुरौ सहमति वायु जु भूति ।।१५।। 'पले तोकौं तन मति ध्यायो, जिन मारग को गुण ब्रहु गायो । तात तेरै शिवपुर प्रायौ. सुमित्र गुर को मन भार्या ।।२४६।३ दूज तोकौं ध्यायो नाही, भयो गुरद्रोही जग माही । कोड़ी है मूवो सो पापी, भयो गदही अति संतापी ॥२४७९
SR No.090270
Book TitleMahakavi Daulatram Kasliwal Vyaktitva Evam Krutitva
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal
PublisherSohanlal Sogani Jaipur
Publication Year
Total Pages426
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth, History, & Biography
File Size7 MB
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