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वामग
श्राद्रप्रभु ( १५ ) :... हिमाली
रडाणा टात शब्द की निरुक्ति करते हुए जयधवलाकार" कहते हैं, "प्रकृष्टन तीर्थ करेण प्रामृतं प्रस्थापितं इति प्रामृतम्"-श्रेष्ठ तीर्थकर के द्वारा आत अर्थात् प्रस्थापित प्रामृत है। दूसरी निरूक्ति इस प्रकार है, "प्रकृष्टैराचार्य विद्या-वित्त-वदभिरामृतं धारित व्याख्यातमानीतमिति प्रामृतम्"-विद्याधन युक्त महान् प्राचार्यों के द्वारा जो धारण किया गया है, व्याख्यान किया गया है अथवा परंपरारूप से लाया गया है, वह प्रामत है।
चूणिसूत्रकार यतिवृषभ विपर्क कहता वा अहसविहिल्लिागलजा महाराज तम्हा पाहुडं"-यह पदों से अर्थात् मध्यमपद और अर्थ पदों से स्फुट अर्थात् स्पष्ट है, इससे इसे पाहुड कहते हैं ।
___ १ कषाय पर भिन्न २ नयों की अपेक्षा दृष्टि डालने पर उसका अभिधेय विविध रूपता को प्राप्त करता है । नैगम, संग्रह, व्यवहार तथा ऋजुसूत्रनय की अपेक्षा क्रोधादि कषायों का वेदन करने वाला जीव कषाय है, कारण जीव को छोड़कर अन्यत्र कषायों का सदभाव नहीं पाया जाता।
शब्दनय, समभिरूढ़ नय तथा एवंभूत नय की अपेक्षा क्रोध, मान, माया तथा लोभ ये कषाय हैं। इन तीन नयों की दृष्टि से क्रोधादिरूप भाव रूप कषायों से भिन्न द्रव्यकर्म कषाय नहीं है । जीव भी कषाय नहीं है। शब्दादि नय त्रय का विषय द्रव्य नहीं है।
वीरसेन स्वामी कहते हैं "कसायविसयं सुदणाणं कसापो, तस्स पाहुर्ड कसायपाहुडं"-कषाय को विषय करने वाला श्रुतज्ञान कषाय है । उसका शास्त्र कषाय पाहुड हैं। __ अब अद्धा परिमाण का प्रतिपादन करते हैं :- १. गम-संगह-ववहार-उजुसुदाणं जीवस्स कसाओ । कुदो ? जीवकसायाणं भेदाभावादो। तिण्हं सद्दणयाणं ण कस्स वि कसानो। भावकसाएहिं वदिरितो जीव-कम्म-दवाणमभावादो ( पृष्ठ ६५ )