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________________ ( २१२ ) अध सुद-मदिउवजोगे होंति अभज्जाणि पुव्धबद्धाणि । भज्जाणि च पञ्चक्खेसु दोसु छदुमत्थखाणेसु ॥१८८६ ॥ श्रुत, कुश्रुतरूप उपयोग में, मति, कुमति रूप उपयोग में पूर्वबद्ध कर्म अभाज्य है, किन्तु दोनों प्रत्यक्ष छद्मस्थज्ञानों में पूर्वबद्ध कर्म भजनीय हैं। सुविधिसागर जी महाराज विशेष मानक: "सुरणाचे देसु चसु उवजोगेसु पुत्रबद्धाणि पियमा अत्थि" श्रुतज्ञान कुश्रुतज्ञान, मतिज्ञान कुमतिज्ञान इन चार उपयोगों में पूर्वबद्ध कर्म नियम से पाए जाते हैं । "श्रहिणाणे प्रणाणे मणपज्जवणाणे एदेसु तिसु उवजोगेसु पुव्वाणि भजियव्वाणि, अवधिज्ञान, विभंगज्ञान, मन:पर्ययज्ञान इन तीन उपयोगों में पूर्वबद्ध कर्म भजनीय हैं। वे किसी के पाये जाते हैं, और किसी के नहीं पाये जाते । कम्माणि भज्जाणिदु अणगार - अचक्खुदंसणुवजोगे । हिसणे पुण उवजोगे होंति भज्जाखि ॥ १६०॥ अनाकार अर्थात् चक्षुदर्शनोपयोग तथा श्रचक्षुदर्शनोपयोग में पूर्वबद्ध कर्म अभाज्य हैं । अवधि दर्शन उपयोग में पूर्वबद्धकर्म कृष्टि वेदक क्षपक के भाज्य हैं । < विशेष— यहां अनाकार उपयोग सामान्य निर्देश होते हुए भी पारिशेष्य न्याय से चक्षुदर्शनोपयोग का हो ग्रहण करना चाहिए" एत्थ अणगारोवजोगे त्ति सामण्णद्दि से वि परिसेसिय-णाएण चक्खुदंसणोवजोगस्सेव गहणं कायन्व' ( २११३ ) प्रश्न – अवधिदर्शन : योग को भाज्य क्यों कहा है ? / समाधान - " ओहिदंसणा व रणक्खस्रोवसमस्स सव्वजी वेसु संभवावलंभादो" अवधिदर्शनावरण का क्षयोपशम सर्व जीवों में संभव नहीं है । इससे इस उपयोग को भाज्य कहा है, क्योंकि यह किसी क्षपक के पाया जाता है तथा किसी के नहीं भी पाया जाता है।
SR No.090249
Book TitleKashaypahud Sutra
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages327
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size7 MB
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