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________________ ( १८ । योदय स्थान में और उत्कृष्ट माया कपाय के उपयोगकाल में जोव विशेषाधिक हैं। इससे प्रजवार्य तुम्कृष्ट कवायोदय स्वानमालथी म्हाराज उत्कृष्ट लोभ के उपयोगकाल में जीव विशेषाधिक हैं । इससे प्रजधन्य-अनुत्कृष्ट कषायोदय स्थान में और जन्घय मान के उपयोग काल में जीव असंख्यात गुणे हैं । इससे अजघन्य-अनुत्कृष्ट कषायो. दय स्थान में और जघन्य क्रोध के उपयोग काल में जीव विशेषाधिक हैं । इससे अजघन्य अनुत्कृष्ट कषायोदय स्थान में और जघन्य माया कषाय के उपयोग काल में जीव विशेषाधिक होते हैं । इससे प्रजघन्य-अनुत्कृष्ट कषायोदय स्थान में और जघन्य लोभ के उपयोग काल में जीव विशेषाधिक हैं। इससे जघन्य-अनुत्कृष्ट कपायोदय स्थान में और अजधन्य-अनुत्कृष्ट मानकषाय के उपयोग काल में जीव असंख्यात गुणित हैं । इससे अजघन्य-अनुत्कृष्ट कपायोदय स्थान में और अजघन्य-अनुत्कृष्ट क्रोधकषाय के उपयोग काल में जीव विशेषाधिक हैं। इससे प्रजघन्य-अनुत्कृष्ट कषायोदय स्थान में और अजघन्य-अनुस्कृष्ट मायाकपाय के उपयोग काल में जीव विशेषा धिक हैं । इससे अजघन्य-अनुत्कृष्ट कपायोदय स्थान में और अजधन्यअनुत्कृष्ट लोभ पापाय के उपयोग काल में जीव विशेषाधिक हैं। इस प्रकार प्राधकी अपेक्षा यह परस्थान अल्पबहुत्व कहा गया। "एवं चेव तिरिक्ख-मणुसगदी सु वि वत्तब्वं'-इसी प्रकार तिर्यच प्रौर मनुष्य गति में भी कहना चाहिए । 'णिरयगदीसु परयाण-अप्पा बहुग्रं चितिय पोदध्वं' नरक गति में परस्थान अल्पवहुन्व विचार करके जानना चाहिए । (पृष्ठ १६४७) अब पंचमी गाथा "केवडिया उचजुना मरिसीसु च वगणाकसाएमु” सदृश क पायोपयोग-वर्गणागों में कितने जीव उपयुक्त हैं, की विभाषा की जाती है। ऐसा गाहा सूचनासुत्तं'-यह गाथा सूचना सूत्र है । इसके द्वारा ये अनुयोगद्वार सूचित किये गये हैं
SR No.090249
Book TitleKashaypahud Sutra
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages327
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size7 MB
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