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° उत्तर-प्रकृति-प्रनुभागविभक्ति
int मोहनीय को मूल प्रकृति को अवयवरुप मोहप्रकृतियों को सुन, उत्तरप्रकृति व्यपदेश किया जाता है। "मोहणीय-मूलपयडीए अवयवभूद-मोहपयडीणमुत्तरपडि त्ति बवएसो" (५५२)।
मोहनीय को नातियों को हाधिकारों का परिज्ञानार्थ स्पर्धकों की रचना का परिज्ञान आवश्यक है। सम्यक्त्वप्रकृति के प्रथम देशघाति स्पर्धक से लेकर अंतिम देशघाति स्पर्धक पर्यन्त ये स्पर्धक होते हैं। सम्यक्त्वप्रकृति का सबसे जघन्य प्रथम स्पर्धक देशघाती है तथा सबसे उत्कृष्ट अंतिम स्पधंक देशघाती है । वह लता रुप न होकर दारु रुप है। सभ्यंग्दर्शन के एक देश का घात करने से सम्यक्त्व प्रकृति के अनुभाग को देशघाती कहा गया है।
२ शक्ति की अपेक्षा कर्मों के अनुभाग के लता, दारु (काष्ठ) अस्थि और शैल ( पाषाण ) रुप चार भेद किए गए हैं । लता और दारु का शेष बहुभाग, अस्थि भाग और शैल रूप अनुभाग सर्वघाती है।
३ शंका- सम्यक्त्व प्रकृति के द्वारा सम्यग्दर्शन का कौनसा भाग धाता जाता है ?
२ सत्ती य लदा-दारु-अट्ठी-सेलोवमा हुँ घादीणं । दारु अणंतिमभागो ति देसघादी तदो सब्वं ॥११॥ देसोत्ति हवे सम्म तत्तो दारु प्रतिमे मिस्म। ऐसा अणंतभागा अट्ठि-सिलाफड्डया मिच्छे ॥१८१॥ गो. कर्मकांड।
•' लदासमाण-जहण्ण-फड्डयमादि कागुण जाव देसघादि दारुणसमाणुक्कस्स फड्डयं ति ट्ठिदसम्मत्ताणुभागस्स कुदो देसघादित्तं ? ण सम्मत्तस्स एकदेसं पाताणं तदविरोहादो । को भागो सम्मत्तस्स तेण घाइज्जदि . थिरत्तं पिक्कंखत्तं ( ५५२)