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पष्ट कर्मग्रन्थ हो गया है, उसके अन्तिम समय में साता का उदय, साता की ससा यह चौथा भंग पाया जाता है । इस प्रकार वेदनीय कर्म के कुल आठ भंग होते हैं।' जिनका विवरण इस प्रकार समझना चाहियेमंग क्रम उदय सत्ता
गुणस्थान असा० २ १, २, ३, ४, ५, ६,
१, २, ३, ४, ५, ६,
१ से १३ तक सा.
१ से १३ तक १४ दिन समापस | १४ द्वि चरम समयपर्यन्त १४ चरम समय में
१४ चरम समय में आयुफर्म के संवेध भंग ___ अब गाथा में बताये गये क्रम के अनुसार आयुकर्म के बंधादि स्थान और उनके संवेध भंगों का विचार करते हैं। आयुकर्म के चार भेदों में कम से पांच, नौ, नौ, पाँच भंग होते हैं। अर्थात् नरकायु के
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१ (क) सेरसमछट्टएएK सायासायाण बंधयोच्छनो।
संसउइण्णाइ पुणो सायासायाइ सब्वेसु ।। बना उद्दण्णयं चि य इयरं वा दो वि संत चउमंगो। संत मुइण्णमबंधे दो दोणि दुसंत इछ अट्ठ।
-खसंग्रह सप्ततिका गा० १७, १० (ख) सादासादेक्कदरं बंधुक्या होति संभवट्ठाणे ।
दोसत्तं जोगित्ति य परिमे उदयागर्द ससं ॥ छटोति चारि मंगा दो मंमा होति जान जोगिजिणे । परभंगाऽजोगिजिणे ठाणं पडि यणीयस्स ॥
-गो० कर्मकार, गा० १३३, ६३४