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________________ षष्ठ कर्मग्रन्थ : गा०५ ર૭ जीवस्थानों में भंगों का विवरण इस प्रकार समझना चाहिएबंध प्रकृति उदय प्रकृति | सत्ता प्रकृति . जीवस्थान । जघन्य उत्कृष्ट बाल | अन्तर्मुहूर्त अन्त महत यथायोग्य 'संही पर्याप्त । एक समय अन्तत | संजो पर्याक्त । एक समय मातहत सयोगि । अन्तमुहत देशम पूर्व केवली | कोटि अयोगि केवली | पा चह्रस्व पचि ह्रस्व स्वरों के स्वरों के उच्चारण उच्चारण कालप्रमाण कालप्रमाण 6 1 1 Hin र इस प्रकार से जीवस्थानों में मुल कर्मों के संवेध भंग समाना चाहिए । अब गुणस्थानों में संवेध भंगों को बतलाते हैं । गुणस्थानों में मूलकर्मों के संवेध भग अट्ठसु एगविगप्पो छस्सु वि गुणसंनिएसु वुविगप्पो। पत्तेयं पत्तेयं बंधोदयसंतकम्माणं ॥ ॥५॥ शब्दार्थ-अमु-आठ गुणस्थानों में, एगविगो-एक बिफल्प, छस्सु-छह में, वि-और, गुणसंनिएसु-गुणस्थानों में, मुबिगप्पो-दो विकल्प, पत्त यं-पत्तेयं--प्रत्येक के, बंधोवसंतकम्मार्ण --वंध, उदय और सत्ता प्रकृति स्थानों के । गाथार्थ-आठ गुणस्थानों में प्रत्येक का बंध, उदय और सत्ता रूप कर्मों का एक-एक भंग होता है और छह गुणस्थानों में प्रत्येक के दो-दो भंग होते हैं। विशेषार्थ-गाथा में चौदह गुणस्थानों में पाये जाने वाले संबंध भंगों का कथन किया है।
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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