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________________ परिशिष्ट-२ ऊह- — चौरासी लाख उहांग का एक कह होता है । कहांग- चौरासी लाख महा अव का समय । (ए) २३ ← एकस्थानिक कर्म प्रकृति का स्वाभाविक अनुमान - फलजनक शक्ति : एकान्त मिध्यात्व — अनेक धर्मात्मक पदार्थों को किसी एक धर्मात्मक ही मानना एकान्त मिथ्यात्व है । एकेन्द्रिय जीव - जिनके एकेन्द्रिय जाति नामकर्म का उदय होता है और सिर्फ एक स्पर्शन इन्द्रिय ही जिनमें पाई जाती है । एकेन्द्रिय जाति नामकर्म — जिस कर्म के उदय से जीव को सिर्फ एक इन्द्रियस्पर्शन इन्द्रम प्राप्त हो । (ओ) मन-सीखा। गुस्साए की विवक्षा किये बिना ही सब जीवों को जो बंध कहा जाता है, उसे ओघबंध या सामान्य बंध कहते हैं । ओघसंज्ञा - अव्यक्त चेतना को ओषसंज्ञा कहा जाता है। www भोजाहार - गर्भ में उत्पन होने के समय जो शुक्रवशोषित रूप आहार कार्मणशरीर के द्वारा लिया जाता है । ( औ) " औरपतिकी बुद्धि जिस बुद्धि के द्वारा पहले बिना सुने बिना जाने हुए पदार्थों के विशुद्ध अर्थ, अभिप्राय को तत्काल प्रण कर लिया जाता है । औयिक भाव — कर्मों के उदय से होने वाला भाव । - ओकारिक अंगोपांग नामकर्म जिस कर्म के उदय से औदारिक शरीर रूप में परिणत पुगलों से अंगोपांग रूप अवयष बनते हैं । औषारिक औदारिकबंधन नामकर्म जिस कर्म के उदम से मौदारिक शरीर पुदगलों का औदारिक पुद्गलों के साथ सम्बन्ध हो । औवारिक कापयोग औदारिक शरीर द्वारा उत्पन्न हुई शक्ति से जीव के प्रदेशों में परिस्पन्द के कारणभूत प्रयत्न का होना अथवा औदारिक शरीर के वीर्य-शक्ति के व्यापार को औदारिक काययोग कहते हैं ।
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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