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________________ I षष्ठ कर्मग्रम्य करने के प्रथम समय से लेकर अप्रत्याख्यानावरण मान, प्रत्याख्यानावरण मान और संज्वलन मान के उपशम करने का एक साथ प्रारंभ करता है। संज्वलन मान की प्रथमस्थिति में एक समय कम तीन आवलिका काल के शेष रहने पर अप्रत्याख्यानावरण मान और प्रत्याख्यानावरण मान के दलिकों का संज्वलन मान में प्रक्षेप न करके संज्वलन माया गाति में पक्षेप करता है दो के शेष पर आगाल नहीं होता किन्तु केवल उदीरणा ही होती है। एक आवलिका काल के शेष रहने पर संज्वलन मान के बंध, उदय और उदीरणा का विच्छेद हो जाता है तथा अप्रत्याख्यानावरण मान और प्रत्याख्यानावरण मान का उपशम हो जाता है । उस समय संज्वलन मान की प्रथमस्थितिगत एक आवलिका प्रमाण दलिकों को और उपरितन स्थितिगत एक समय कम दो आवलिका काल में बद्ध दलिकों को छोड़कर शेष दलिक उपशान्त हो जाते हैं | ४१५ तदनन्तर प्रथम स्थितिगत एक आवलिका प्रमाण संज्वलन मान के दलिकों का tितबुकसंक्रम के द्वारा कम से संज्वलन माया में निक्षेप करता है और एक समय कम दो आवलिका काल में बद्ध दलिकों का गुरुषवेद के समान उपशम करता है और पर प्रकृति रूप से संक्रमण करता है। इस प्रकार अप्रत्याख्यानावरण मान और प्रत्याख्यातावरण मान के उपशम होने के बाद एक समय कम दो आवलिका काल में संज्वलन मान का उपशम हो जाता है । जिस समय संज्वलन मान के बंध, उदय और उदीरणा का विच्छेद हो जाता है, उसके अनन्तर समय से लेकर संज्वलन माया की द्वितीय स्थिति से दलिकों को लेकर उनकी प्रथम स्थिति करके वेदन करता है तथा उसी समय से लेकर अप्रत्याख्यानावरण माया, प्रत्याख्यानावरण माया और संज्वलन माया के उपशम करने का एक साथ प्रारंभ करता है । संज्वलन माया की प्रथमस्थिति में एक समय कम तीन
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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