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________________ सप्ततिका प्रकरण विकल्प बनते हैं, किन्तु वाचाशक्ति की मर्यादा होने के कारण जिनका पूर्णरूपेण कथन किया जाना सम्भव नहीं होने से क्रमश: मूल और उत्तर प्रकृतियों में सामान्यतया उन विकल्पों का कथन करते हैं । ww इस प्रकार इस गाथा के वाच्यार्थ पर विचार करने पर दो बातों को सूचना मिलती है। प्रथम यह कि इस प्रकरण में मुख्यतया पहले मूल प्रकृतियों और इसके बाद उत्तर प्रकृतियों के बन्ध-प्रकृति स्थानों, उदय प्रकृतिस्थानों और सत्व - प्रकृतिस्थानों का तथा उनके परस्पर संवेध' और उनसे उत्पन्न हुए भंगों का विचार किया गया है। दूसरी बात यह है कि उन भंग-विकल्पों को यथास्थान जीवस्थानों और गुणस्थानों में घटित करके बतलाया गया है । इस विषय विभाग को ध्यान में रखकर टीका में सबसे पहले बाठ मूल प्रकृतियों के बंध - प्रकृतिस्थानों, उदय प्रकृतिस्थानों और सत्वप्रकृतिस्थानों का कथन किया गया है। क्योंकि इनका कथन किये बिना आगे की गाथा में बतलाये गये इन स्थानों के संबेध का सरलता से ज्ञान नहीं हो सकता है। साथ ही प्रसंगानुसार इन स्थानों के स्वामी और काल का निर्देश किया गया है, जिनका स्पष्टीकरण नीचे किया जा रहा है । बंधस्थान, स्वामी और उनका काल : कर्मों की मूल प्रकृतियों के निम्नलिखित आठ भेद हैं- १. ज्ञानावरण, २. दर्शनावरण, ३. वेदनीय, ४. मोहनीय ५. आयु, ६ नाम, ७. गोत्र और ८. अंतराय । इनके स्वरूप लक्षण बतलाये जा चुके हैं। मूल कर्म प्रकृतियों के आठ प्रकृतिक, सात प्रकृतिक, छह १. सयेधः परस्परमेककाला मागम विरोधेन मोलनम् । 1 कर्म प्रकृति बन्धोदय०, पृ० ६५.
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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