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________________ २५४ सप्ततिका प्रकरण इस प्रकार से जीवस्थानों में आठ कर्मों की उत्तर प्रकृतियों के बंध, उदय व सत्ता स्थान तथा उनके भंगों का कथन करने के बाद अब गुणस्थानों में भंगों का कथन करते हैं । गुणस्थानों में संवेध भंग सर्वप्रथम गुणस्थानों में ज्ञानावरण और अन्तराय कर्म के बंधादि स्थानों का कथन करते हैं नाणंतराय तिविमयि दससु वो होंति दोसु ठाणेसुं । शब्दार्थ - नाणंत राय - ज्ञानावरण और अन्तराध कर्म, सिंहिमवि-तीन प्रकार से (बंध, उदय और सत्ता की अपेक्षा ), बससु आदि के दस गुणस्थानों में दो-दो (उदय और सत्ता ), होंतिहोता है, दो-दो (उपशांतमोह और क्षीणमोह में ), ठाणेसुं— गुणस्थानों में । - गाथार्थ - प्रारम्भ के दस गुणस्थानों में ज्ञानावरण और अन्तराय कर्म बन्ध, उदय और सत्ता की अपेक्षा तीन प्रकार का है और दो गुणस्थानों (उपशांतमोह, क्षीणमोह) में उदय और सत्ता की अपेक्षा दो प्रकार का है । विशेषार्थ - पूर्व में चौदह जीवस्थानों में आठ कर्मों के बंध, उदय और सत्ता स्थान तथा उनके संवेध भंगों का कथन किया गया। अब गुणस्थानों में उनका कथन करते हैं । ज्ञानावरण और अन्तराय कर्म के बारे में यह नियम है कि ज्ञानावरण की पांचों और अन्तराय की पाँचों प्रकृतियों का बन्धविच्छेद दसवें सूक्ष्म संपराय गुणस्थान के अन्त में तथा उदय और सत्ता का विच्छेद बारहवें क्षीणमोह गुणस्थान के अन्त में होता है । अतएव इससे यह सिद्ध हो जाता है कि पहले मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर दसवें गुणस्थान तक दस गुणस्थानों में ज्ञानावरण और अन्तराय कर्म के पाँच
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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