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________________ १६६ षष्ठ कर्मग्रन्थ में से किसी एक का उदय होने के कारण २x२२ = ८ भङ्ग होते हैं। अनन्तर शरीर पर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के पराघात और प्रशस्त विहायोगति इन दो प्रकृतियों को २५ प्रकृतिक उदयस्थान में मिला देने पर २७ प्रकृतिक उदय होता है. यहाँ भी पूर्ववत् क भङ्ग होते हैं । उक्त २७ प्रकृतिक उदयस्थान में प्राणापान पर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के उच्छवास प्रकृति को मिला देने पर २८ प्रकृतिक उदयस्थान होता है । यहाँ भी पहले के समान आठ भङ्ग होते हैं । अथवा शरीर पर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के यदि उद्योत का उदय हो तो भी २८ प्रकृतिक उदयस्थान होता है, यहाँ भी आठ भङ्ग होते हैं। इस प्रकार २८ प्रकृतिक उदयस्थान के सोलह भङ्ग होते हैं । अनन्तर भाषा पर्याप्त से पर्याप्त हुए जीव के उच्छवास सहित २८ प्रकृतियों में सुस्वर के मिलाने पर २६ प्रकृतिक उदयस्थान होता है। यहाँ भी आठ भ होते हैं । अथवा प्राणापान पर्याप्त से पर्याप्त हुए जीव के उच्छवास सहित २८ प्रकृतियों में उद्योत को मिलाने पर भी २६ प्रकृतिक उदयस्थान होता है। इसके भी आठ भङ्ग होते हैं । इस प्रकार २१ प्रकृतिक उदयस्थान के कुल सोलह भङ्ग होते हैं । अनन्तर सुस्वर सहित २६ प्रकृतिक उदयस्थान में उद्योत को मिलाने पर ३० प्रकृतिक उदयस्थान होता है । इसके भी आठ भङ्ग होते हैं । इस प्रकार बैकिय शरीर को करने वाले पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के कुल उदयस्थान २५, २७, २८, २६ और ३० प्रकृतिक और उनके कुल भङ्ग ८+६+१६+१६+६५६ होते हैं। इन ५६ भङ्गों को पहले के सामान्य पंचेन्द्रिय तिर्यंच के ४६०६ भङ्गों में मिलाने पर सब तिमँचों के कुल उदयस्थानों के ४९६२ भङ्ग होते हैं ।
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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