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________________ षष्ठ कर्ममन्य १६७ शरीरस्थ नियंच पंचेन्द्रिय के २६ प्रकृतिक उदयस्थान होता है। उक्त २१ प्रक तिक उदयस्थान में औदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग, छह संस्थानों में से कोई एक संस्थान, छह संहननों में से कोई एक संहनन, उपघात और प्रत्येक, इन छह प्रकृतियों को मिलाने तथा तिर्यंचानुपूर्वी के निकाल देने पर यह २६ प्रकृतिक उदयस्थान बनता है। इस २६ प्रकृतिक उदयस्थान के भंग २८६ होते हैं । क्योंकि पर्याप्त के पद संस्थान, छह संहनन और सुभग आदि तीन युगलों की संख्या को पररपर गुणित करने पर ६x६x२x२x२= २८८ भंग होते हैं तथा अपर्याप्त के हुंडसंस्थान, सेवात संहनन, दुर्भग, अनादेय और अयश-कीर्ति का ही उदय होता है अत: यह एक भंग हुआ। इस प्रकार २६ प्रकृतिक उदयस्थान के कुल २८६ भङ्ग होते हैं । शरीर पर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के इस छब्बीस प्रकृतिक उदयस्थान में पराघात और प्रशस्त व अप्रशस्त विहायोगति में से कोई एक इस प्रकार इन दो प्रकृतियों के मिलाने पर २८ प्रकृतिक उदयस्थान होता है । इसके भङ्ग ५७६ होते हैं। क्योंकि पूर्व में पर्याप्त के जो २८८ भङ्ग बतलाये हैं उनको प्रशस्त और अप्रशस्त विहायोगति से गुणित करने पर २८८४२=५७६ होते हैं। ___ उक्त २८ प्रकृतिक उदयस्थान में उच्छ वास को मिला देने पर २६ प्रकृतिक उदयस्थान होता है । इसके भी पहले के समान ५७६ भंग होते हैं । अथवा शरीर पर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीत्र के उच्छ बास का उदय नहीं होता है. इसलिए उसके स्थान पर उद्योत को मिलाने पर भी २६ प्रकृतिक उदयस्थान होता है। इसके भी ५.७६ भंग होले हैं। इस प्रकार २६ प्रकृतिक उदयस्थान के कुल भंग ५७६ + ५७६=११५२ होते हैं। उक्त २९ प्रकृतिक उदयस्थान में भाषा पर्याप्ति से पर्याप्त हुए
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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