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शतक
(५) नामकर्म -- निर्माण, स्थिर, अस्थिर, अगुरुलघु, शुभ, अशुभ तैजस शरीर, कार्मण शरीर, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श ।
१५) अंतराय-दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य अन्तराय |
इनका विवेचन गाथागत क्रम के अनुसार करते हैं। नामकर्म की निर्माण, स्थिर, अस्थिर, अगुरुलघु, शुभ, अशुभ, तेजस, कार्मण तथा वर्णचतुष्क यह बारह प्रतियां ध्रुवोदका, क्योंकि पाशे पति के जीवों में इनका उदय सर्वदा रहता है । जब तक शरीर है तब तक इनका उदय अवश्य बना रहेगा। तेरहवें मुणस्थान के अंत में इन वारह प्रकृतियों का उदयविच्छेद होता है किन्तु वहाँ तक सभी जीवों के इन बारह प्रकृतियों का उदय बना रहता है। ___ यद्यपि स्थिर, अस्थिर तथा शुभ, अशुभ ये चार प्रकृतियाँ परस्पर विरोधिनी कहलाती हैं । लेकिन इनका विरोधित्व बंध की अपेक्षा है, क्योंकि स्थिर नामकर्म के समय अस्थिर नामकर्म का और शुभ नाम के समय अशुभ नामकर्म का बंध नहीं हो सकता है, किन्तु उदयापेक्षा इनमें विरोध नहीं है । स्थिर और अस्थिर का उदय एक साथ हो सकता है। क्योंकि स्थिर नामकर्म के उदय से हाड़, दांत आदि स्थिर होते हैं और अस्थिर नामकर्म के उदय से रुधिर आदि अस्थिर होते हैं, इसी प्रकार शुभ नामकर्म के उदय से मस्तक आदि शुभ अंग होते हैं और अशुभ नामकर्म के उदय से पैर आदि अशुभ अंग । अतएव ये चारों प्रकृतियां बंध की अपेक्षा बिरोधिनी होने पर भी उदयापेक्षा अविरोधिनी मानी गई हैं।
पांच ज्ञानावरण, पांच अंतराय और चार दर्शनावरण इन चौदह प्रकृतियों का उदय अपने क्षय होने वाले गुणस्थान तक बना रहता है । इनका क्षत्र वारहवे गुणस्थान के चरम समय में होता है । अतएव इन्हें १ नाणंतराप दसण चल ओ सजोगि वायाला । – द्वितीय कर्मग्रन्थ गा० २०