SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 354
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ का कर्मग्रन्थ ३१७ है कि-उत्सेधांगुल' के द्वार, विष्णन एक गोला माण नया, एक योजन प्रमाण चौड़ा और एक योजन प्रमाण गहरा एक गोल पल्यगढ़ा बनाना चाहिए, जिसकी परिधि कुछ कम ३१ योजन होती है । एक दिन से लेकर सात दिन तक के उगे हुए बालायों से उस पल्य को इतना ठसाठस भर देना चाहिये कि न आग उन्हें जला सके, न वायु उड़ा सके और न जल का ही उसमें प्रवेश हो सके । इस पल्य से प्रति समय एक-एक बालान निकाला जाये । इस तरह करते-करते जितने समय में वह पल्यखाली हो जाये, उस काल को बादर उद्धारपल्य' कहते हैं। ____दस कोटाकोटी बादर उद्धारपल्योपम का एक बादर उद्धारसागरोपम होता है । इन बादर उद्धारपल्योपम और बादर उद्धारसागरोपम का इतना ही प्रयोजन है कि इनके द्वारा सूक्ष्म उद्धारपल्योपम और सूक्ष्म उद्धारसागरोपम सरलता से समझ में आ जाये अस्मिम्मिरूपिते सूक्ष्मं सुबोधमयुधरपि । असो निरूपितं नान्यरिकञ्चिदस्य प्रयोजनम् ।।- द्रव्यलोकप्रकाश १।८६ अंगुल के तीन भेद हैं—आस्मांगुल, उत्सेधांगुल और प्रमाणांगुण । इनकी व्याख्या आगे की गई है। २ पल्म को बालारों से भरने संबन्धी अनुयोगद्वार सूत्र आदि का विवेचन परिशिष्ट में दिया गया है। ३ पल्य को ठसाठस भरने के संबन्ध में द्रव्यलोकप्रकाश सग १५८२ में स्पष्ट किया है तथा च चक्रिसन्येन तमाक्रम्य प्रसप्ता। न मनाक क्रियते नीचरेवं निबिड़तागताम् ॥ वे केशान इतने बने भरे हुए हों कि यदि चक्रवर्ती की सेना उन पर से निकल जाये तो वे जरा भी नीचे न हो सके।
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy