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________________ २१६ अब आगे की चार गाथाओं में शेष प्रकृतियों के नाम गिनाकर उनके निरन्तर बंध के समय को बतलाते हैं । समयादसंखकाल तिरिदुगनीएसु आउ अंतमुह । उरलि असंखपरट्टा सार्याठई पुरुष कोणा ॥५६३ जलहिलयं पणसीय परघुस्सा से पणिवितसच उगे । बत्तोस सुविहगमसुभगांत गुच्चचरसे ॥६०॥ असुखगइजा आणि संघयणाहारनश्यओयगं । थिर सुभजस्थावर दसर पुहत्थोयलमसायं ॥ ६१॥ समयादतमुहुसं मणुदुर्ग जिणवहर उरलवंगेसु । तित्तोसयरा परमा अंतमूह लहू वि आउजिणे ॥ ६६ ॥ शब्दार्थ - समयादसंखकालं – एक समय से लेकर असंख्य काल तक, तिरियुगनोएस तियंत्रद्विक और नीचगोत्र का आज आयुकर्म का अंतमुह-मन्तर्मुहूर्त तक, उलि – औदारिक शरीर का असंख परट्टा – असंख्यात पुद्गल परावर्त, सायठिई — सातावेदनीय का बंध, पुरुषकोगा- पूर्व कोटि वर्ष से न्यून | — r जलहिलयं - एक सौ सागरोयम, पणसीयं पचासी परघुस्सा से पराघात और उच्छवास नामकर्म का पणिदि पंचेन्द्रिय जाति का, तसच चमचतुष्क का बत्तीसं - बत्तीस, मुँहविहगढ शुभ विहायोगति, पुम–पुरुष वेद, सुभगलिंग – सुभगत्रिक, उच्च – उच्चगोत्र, चउरंसे समचतुरस्रसंस्थान का । → असुखगद्द - अशुभ विहायोगति, जाइ एकेद्रिय आदि चतुरिन्द्रिय तक जाति, आगि संघयण - पहले के सिवाय पांच संस्थान और पांच मंहनन, आहारनरयजयदुर्ग- आहारकद्विक, नरककि, उद्योतठिक थिरसुभगस स्थिर, शुभ, यशः कौर्ति नाम, शतक —
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
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