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उक्त पांचों का सामान्य विवेचन इस तरह है
सर्वप्रथम आत्मा अपर्वतनःकरण के द्वारा फार्मों को अन्तर्मुहर्त में स्थापित कर पुणश्रेणि का निर्माण करती है । स्थापना का अम यह है कि-उदयकालीन समय को लेकर अन्तर्मुहूतं पर्यन्त प्रथम उदया. स्मक समय को छोड़कर अन्तर्मुहर्त के शेष जितने समय हैं, इनमें कर्मदलिकों को क्रमबद्ध श्रेणी रूप से स्थापित किया जाता है । प्रथम समय में स्थापित कर्मदलिक सबसे कम होते हैं। दूसरे समय में स्थापित कर्मदलिक प्रथम समय में स्थापित कर्मदलिकों से असंख्यात गुणे अधिक, तीसरे समय में द्वितीय समय से भी असंख्यात गुणे अधिक होते हैं। यह क्रम अन्तर्मुहुर्त के चरम समय तक जानना चाहिए । इस प्रकार प्रत्येक समय कर्मदलिकों की स्थापना असंख्यात गुणी अधिक होने के कारण इसे गुणवेणि कहा जाता है ।
इस अवसर पर आत्मा अतीव स्वल्प स्थिति के कर्मों का बन्धन करती है, जैसा उसने पहले कभी नहीं किया है । अतः इस अवस्था का बंध अपूर्व स्थितिबंध कहलाता है । स्थितिघात और रसघात भी इस समय में अपूर्व होता है । गुण-संप्रामण में अशुभ कर्मों की शुभकर्म रूप परिणति होती जाती है ।
अष्टम गुणस्थान से लेकर आगे के गुणस्थानों में ज्यों-ज्यों आत्मा वढ़ती है, त्यों-त्यों अल्प समय में कर्मदलिक अधिक मात्रा में क्षय होते जाते हैं।
इस उत्क्रान्ति की स्थिति में बढ़ती हुई आत्मा जन्न परमात्मशक्ति को जागृत करने के लिए सन्नद्ध हो जाती है, आयु अल्प रहता है एवं कर्मदलित अधिक रहते हैं तब इन अधिक स्थिति और दलिको बाले कर्मों को आयु के समय के बराबर करने के लिए केवलीसमुद्यात होता है । इस समुद्घात काल में अधिक शक्तिशाली माने जाने वाले कर्मों को आत्मा अपने वीर्य से पराजित कर दुर्बल बना देती है।