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________________ १६० बहुत्व का कथन प्रारंभ होता है और संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टि को सबसे उत्कृष्ट स्थितिबंध होता है। जिससे अल्पबहुत्व का वर्णन वहां आकर समाप्त हो जाता है । अर्थात् स्थितिबंध का अस्पबहुत्व बतलाने के प्रसंग में सूक्ष्मसंपराय गुणस्थान एक छोर है और संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टि दूसरा छोर । सूक्ष्मसंपराय गुणस्थान जघन्य स्थितिबंध का चरमबिन्दु है और संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टि उत्कृष्ट स्थितिबंध का चरमबिन्दु और इन दोनों के बीच अल्पबहुत्व का कथन किया जाता है । चरम जघन्य स्थितिबंध से प्रारंभ होकर चरम उत्कृष्ट स्थितिबंध तक के अल्पबहुत्व का क्रम इस प्रकार है १. सबसे जघन्य स्थितिबंध सूक्ष्मसंपराय गुणस्थानवर्ती साधुविरति को होता है । २. उससे यानी सूक्ष्मसंपराय गुणस्थानवर्ती साधु से बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त का जघन्य स्थितिबंध असंख्यात गुणा है । ३. बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त से सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त के होने वाला जघन्य स्थितिबंध कुछ अधिक है । ४. सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त की अपेक्षा बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त के होनेवाला जघन्य स्थितिबंध कुछ अधिक है । ५. बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त से सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त के होने वाला जघन्य स्थितिबंध कुछ अधिक है । ६. उससे सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त का उत्कृष्ट स्थितिबंध कुछ अधिक है । ७. उससे बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त का उत्कृष्ट स्थितिबंध कुछ अधिक है । ८. उससे सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त का उत्कृष्ट स्थितिबंध कुछ अधिक है । अक
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
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