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गुणस्थान के बाद उपयोग के निर्देश का तात्पर्य यह है कि जो उपयोगवान हैं, उन्हीं में गुणस्थानों का सम्भव हैं। उपयोग-शूग्य आकाशा आदि में नहीं । उपयोग के अनन्तर योग के कथन का आशय यह है कि उपयोग वाले बिना योग के कर्म-ग्रहण नहीं कर सकते । जैसे:- सिद्ध । योग के पीछे लेश्या का कथन इस अभिप्राय से किया है कि योगद्वारा ग्रहण किये गये कर्म-पुबगलों में भी स्थितिबन्ध व अनुभागबन्ध का निर्माण लेश्या ही से होता है। लेश्या के पश्चात् बन्ध के निर्देश का मतलब यह है कि जो जीव लेश्या-साहित हैं, वे हो कर्म बांष सकते हैं । बन्ध के बाव अल्पबहत्व का कथन करने से ग्रन्धकार का तात्पर्य यह है कि बन्ध करने वाले जीव, मार्गणस्थान आदि में वर्तमान होते हुए आपस में अवश्य न्यूनाधिक हुआ करते हैं । अल्पमहत्व के अनन्तर भाव के कहने का मतलब यह है कि जो जीव अल्पबहत्व वाले हैं, उनमें औपशमिक प्राधि किसी-न-किसी भाव का होना पाया हो जाता है । भाव के बाद संस्पात आदि के कहने का तात्पर्य यह है कि भाववाले जीवों का एक दूसरे से जो अल्पबहत्व है, उसका वर्णन संस्थात, अप्स्यात आवि संख्या के द्वारा ही किया जा सकता है।