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________________ ४७ * रहित होने के कारण योग नहीं कहा जा सकता । इसके विपरीत जब से मिथ्यात्व कर तिमिर कम होने के कारण आत्मा को भ्रान्ति मिटने लगती है और उसकी गति सीधी अर्थात् सम्मा के अभिमुख हो जाती है, तभी से उसके व्यापार को प्रणिधान आदि शुभ- भाव सहित होने के कारण' योग' संज्ञा दी जा सकती है। सारांश यह है कि आत्मा के आनादि सांसारिक काल के वो हिस्से हो जाते हैं । एक चरमपुद्गलपरावर्त और दूसरा अचरम पुद्गलपरावर्त कहा जाता है । चरमपुद्गलवरावतं अनादि सांसारिक काल का आखिरी और बहुत छोटा अंश हैं । अघरभपुगलपरावर्त उसका बहुत बड़ा भाग है। क्योंकि चरमपुद्गलपरावर्त को याद करके अनादि सांसारिक काल, जो अनन्तकालचक्र परिमाण है, वह सब अचरमपुद्गलपरावर्त कहलाता है। आत्मा का सांसारिक काल जब चरमपुद्गलपरावर्त - परिमाण बाकी रहता है, तथ उसके ऊपर से मिथ्यात्वमोह का आवरण हटने लगता है । अत एव उसके परिणाम निर्मल होने लगते हैं और क्रिया मी निर्मल भावपूर्वक होती है। ऐसी क्रिया से भाव-शुद्धि और भी बढ़ती है। इस प्रकार उत्तरोत्तर भावशुद्धि बढते जाने के कारण चरमपुद्गलपरावर्तकालीन धर्म व्यापारको योग कहा है । अचरमपुद्गल परावतं कालीन व्यापार न तो शुभभावपूर्वक होता है और न शुभ- माव का कारण हो होता है। इसलिये व परम्परा से मी मोक्ष के न होने के सबब से योग नहीं कहा जाता। पास जलदर्शन में भी अनवि सांसारिक काल के निवृताधिकार प्रकृति और अनिवृत्तिविकार प्रकृति इस * : 'चरमावतिनो जन्तोः सिद्धेरासम्मता भवम् । भूमसोऽभी व्यतिक्रान्तास्तेष्वेको बिन्दुरम्बुधौ ॥ २८ ॥ " - मुष्य द्वेष प्राधान्यद्वात्रिशिका
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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