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भाग्छन्न रहता है, जिसके कारण आत्मा मिथ्याध्यास वाला होकर पौद्ध लिक विलासों को ही सर्वस्व मान लेता है और उन्हीं को प्राप्ति केलिये सम्पूर्ण शक्ति का व्यय करता है ।
सूसरी अवस्था में मात्मा का वास्तविक स्वरूप पूर्णतया तो प्रकट महीं होता, पर उसके ऊपर का भावरण गाड़ न होकर शिथिलशिथिलतर, शिथिलतम बन जाता है, जिसके कारण उसको पुष्टि पौलिक विलासों की ओर से हट कर शुद्ध स्वरूप की ओर सग जाती है। इसी से उसको पुष्टि में शरीर भावि की जीर्णता में नवीनता अपनी जीर्णता व नवोनसा नहीं है । यह दूसरी. अश्स्था ही तीसरी अवस्था का द सोपान है।
तोसरी अवस्था में आत्मा का वास्तविक स्वरुप प्रकट हो जाता है अर्थात् उसके ऊपर के घने आवरण बिलकुल विलीन हो जाते हैं।
पहला, वूसरा और तीसरा गुणस्थान बहिरास्म-अवस्था का चित्रण है। चौथे से बारहवें सफ के गुणस्थान अन्तरात्म-अवस्था का विवर्मन है और तेरहवाँ, चौवा गुणस्थान परमात्म-अवस्था का वर्णन है ।
* अन्ये तु मिथ्यादर्शनादिभावपरिणतो वा यास्मा, सम्यग्दर्शनादिपरिणतस्त्वन्तरात्मा, केवलज्ञानादिपरिणतस्तु परमात्मा । तत्राद्यगुणस्थानत्रवे वाह्मात्मा, ततः परं क्षीणमोगुणस्थानं यावदन्तरास्मा, तस; परन्तु परमात्मेति । तथा व्यक्त्या बाह्मात्मा, शक्त्या परमारमान्तरात्मा च । व्यक्तयान्त गत्मा तु शक्त्या परमात्मा अनुभूतपूर्वनयेन च बाह्यात्मा, व्यक्तया परमात्मा, अनुभूतपूर्वनमेनय बाह्यास्मान्तरात्मा च ।"
- अध्यात्म मतपरीक्षा, गाथा १२५ ।