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________________ कर्मग्रन्थ भाग चार आपस में अन्तर सम्यक्त्व सहेतुक है या निर्हेतुक ? क्षायोपशमिक आवि मेवों का आधार, औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व का क्षायिक सम्यगवीकी उन दोनों से विशेषता, कुछ काकोक्य और प्रदेश का स्वरुप क्षयोपशम तथा व्याख्या एवं अन्य प्रासङ्गिक विचार 19 - १३६ । शङ्कर- समाधान, उपशम-शब्द की अपर्याप्त अवस्था में इन्द्रियपर्याप्त पूर्ण होने के पहिले चलूशन नहीं माने जाने और चक्षुर्दर्शन माने जाने पर प्रमाण पूर्वक विचार । १०- १४१ । २४५ वक्रगति के सम्बन्ध में तीन बातों पर सविस्तार:- (१) वक्रगतिके विग्रहों को संख्या (२) वक्रगति का काल-मान और (३) वक्षगति में अनाहारकल्प काल मान । पु०-१४३ | अवधिदर्शन में गुणस्थानों की संख्या के विषय में पक्षमेव तथा प्रत्येक पक्ष का तात्पर्य अर्थात् विभङ्गज्ञान से अवधिदर्शन का भेदाभेव । पु० - १४६ । श्वेताम्बर दिगम्बर संप्रदाय में कबलाहार विषयक मतभेद का समन्वय । पु० - १०८ केवल ज्ञान प्राप्त कर सकने वाली स्त्रीजाति के लिये श्रुतज्ञानविशेष का अर्थात् दृष्टिबाव के अध्ययन कर निषेध करना, यह एक प्रकार से विरोध है । इस सम्बन्ध में विचार तथा नय-दृष्टि से विरोध का परिहार | पृ० – १४६ । क्षुदंर्शन के योगों में से औदारिकमिश्रयोग का वर्जन किया है, सो किस तरह सम्भव है ? इस विषय पर विचार | पु०-१६४ । केवलिमुद्धात सम्बन्धी अनेक विषयों का वर्णन उपनिषदों में तथा गीता में जो आत्मा की व्यापकता का वर्णन है, उसका प्रेम-दृष्टि से मिलान और केवलिमुद्धात जैसी क्रिया का वर्णन अन्य किस दर्शन में हैं ? इसकी सूचना |०-१५ ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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