SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 311
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ कर्मचन्त्य भाग बार २४० परिशिष्ट नं० ३। चौथा कर्मग्रन्थ तथा पञ्चसंग्रह । जीवस्थामो में योग का विचार पञ्चसंग्रह में भी है । पृ०१५, नोट। अपर्याप्त जीवस्थान के योगो के संबन्ध का मत-भेव जो इस कर्म प्रग्य में है, वह पञ्चांग्रह को धीमा में विस्तारपर्वक है । प०- १६ । जीवस्थान में उपयोगों का विचार पञ्चसाह में भो है । ५।२०, नोट । कर्मग्रन्थ कारने विमङ्गज्ञान में वो जीवस्थानो का और पञ्चसंग्रह काग्ने एक जीवस्थान का उल्लेख किया है । प०-६८, नोट । अपर्याप्त-अवस्था में औपशमिकसम्यक्तष पाया जा सकता है, यह बात पञ्चपह में भी है । पृ-७० नोट । पुरुषो से स्त्रियो को सख्या अधिक होने का वर्णन पांग्रह में है। पु०-१२५, नोट । पञ्चाग्रह में मी गुणस्थानो को लेकर लेकर योगो का विचार है। पु. १६३, नोट । गुणस्थान में उपयोग का वर्णम पञ्चसंग्रह में है । पृ०-१६७, नोट । बन्ध-हेतुभो के उत्तर भेव तथा गुणस्थानो में मूल बम-हेतुओका विचार पञ्चांग्रह में है । पु०-१७५, नोट । सामान्य तथा विशेष बन्ध-हेतुभो का वर्णन पञ्चसंग्रह में विस्तृत है । पृ०-१८१, नोट ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy