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________________ कर्मग्रन्थ माग चार वार, वो. योग उपयोग, चार और काययोग में जीवस्थान घार, गुणस्थान वो, योग पाँच और उपयोग तोन मानते हैं ॥३५॥ १११ भावार्थ- पहले किस प्रकार की विशेष विवक्षा किये बिना ही मन, वचन और कापयोग में जीवस्थान आदि का विचार किया गया है; पर इस गाथा में कुछ विशेष विवक्षा करके । अर्थात् इस जगह प्रत्येक योग यथासम्भव अन्य योग से रहित लेकर उसमें जीवस्थान आदि दिखाये हैं । यथासम्भव कहने का मतलब यह है कि मनोयोग हो समय योगति विजय वचनकाय उपयोग सहचरित ही लिया जाता है। पर वचन तथा काययोग के विषय में यह अरत नहीं; वचनयोग कहीं काययोग रहित म मिलने पर मी द्वीन्द्रियादि में मनोयोग रहित मिल जाता है। इसलिये वह मनोयोग रहित लिया जाता है। काययोग एकेन्द्रिय में मन-वचन उभय योगरहित मिल जाता है। इससे वह वंसा हो लिया जाता है । i मनोयोग में अपर्याप्त और पर्याप्त संज्ञी, ये वो जीवस्थान हैं, अप नहीं; क्योंकि अन्य जीवस्थानों में मनः पर्याप्त द्रव्यमन आदि सामग्री न होने से मनयोग नहीं होता । मनोयोग में गुणस्थान तेरह है; क्योंकि चौदहवें गुणस्थान में कोई मो योग नहीं होता । मनोयोग पर्याप्त अवस्था - भावो है, इस कारण उसमें अपर्याप्त व्यवस्था-मायी कार्मण और औदारिकमिश्र, इन दो को छोड़ शेष तेरह योग होते हैं । यद्यपि केवलिसमुद्घात के समय पर्याप्त अवस्था में भी उक्त वो यौन होते हैं । तथापि उस समय प्रयोजन न होने के कारण केवलज्ञानो मनोद्रव्य को ग्रहण नहीं करते। इसलिये उस अवस्था में भी उक्त दो योग के साथ मनोयोग का साहचर्य नहीं घटता | मनवाले प्राणियों में सब प्रकार के बोध की शक्ति पायी जाती है; इस कारण मनायोग में बारह उपयोग कहे गये है ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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