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________________ फर्मग्रन्थ भाग चार ७७ पहले मत के अनुसार उनमें स्वयोग्य पर्याप्तियां पूर्ण बन जाने के बाव ही चक्षुर्दशन माना जाता है। दूसरे मत के अनुसार स्वभोग्य पर्याप्तियों पूर्ण होने के पहले भी-अपर्याप्स-अवस्था में मी-चक्षुदर्शन माना जाता है। किन्तु इसके लिये इन्द्रियपर्याप्सि का पूर्ण सम जाना आवश्यक है। क्योंकि इन्द्रियपर्याप्ति न बन जाय सब तक आंत के पूर्ण न बनने से वक्षुदर्शन हो ही नहीं सकता। इस दूसरे मत के अनुसार चक्षुर्वशंम में छह जीवस्थान माने हुए हैं और पहले मत के अनुसार तीन जीवस्थान ।। १७ ॥ __ थोनरपणिदि चरमा, च उ अणहारेद् सनि छ अपज्जा । ते सुहमअपज्ज विणा, सासणिइत्तो गुणे बुच्छं ॥१८॥ स्त्रीनरपञ्चेन्दिये चरमाणि, चत्वार्यनाहारके द्वौ सान्झनो पडपर्याप्ताः । ते सूक्ष्माषर्याप्त बिना, सासादन इतो गुणान् वक्ष्ये ॥१८ ।। ___ अर्थ-स्त्रोवेद, पुरुषवेद और पञ्चेन्द्रियजाति में अन्तिम चार ( अपर्याप्त तथा पर्याप्त असंशि-पञ्चेन्द्रिय, अपर्याप्त तथा पर्याप्त संजि-पञ्चेन्द्रिय ) जीवस्थान हैं। अनाहारकमार्गणा में अपर्याण-पर्याप्त दो संजी और सूक्ष्म-एकेन्द्रिय, बादर-एकेन्द्रिय, वीन्द्रिय, श्रोत्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंजि-पञ्चेन्द्रिय, ये छह अपर्याप्त, फुल शाह जीवस्थान हैं । सासावनसम्यक्त्व में उक्त आठ में से सूक्ष्म-अपर्याप्त को छोड़कर शेष सात जीयस्थान हैं। अब आगे गुणस्थान कहे जायंगे ॥ १८ ॥ भावार्थ-स्त्रीवेव आदि उपर्युक्त तीम मार्गणाओं में अपर्याप्त "करणापर्याप्तेषु चतुरिन्द्रियाविष्विन्द्रियपर्याप्ती सस्यो चक्षुर्वर्शनमपि प्राप्यते ॥" इन्द्रिप्रपर्याप्ति की उक्त दोनों व्यास्याओं का बल्लेख, लोक प्र० स० ३ श्लोक २०-२१ में है।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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