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________________ after rape के अधिकारी देव तथा नारक होते हैं। क्योंकि देव और नारकों का उपपातजन्म होता है । जन्म वालों को वैश्रिय शरीर होता है। इससे इसमें गुणस्थान देवगति के समान ही माने गए हैं और इसका स्वामित्व भी देवमति के समान हो, अर्थात् सामान्य से १०४, पहले गुणस्थान में १०३. दूसरे में ६६, तीसरे में 90 और चौथे में ३२ प्रकृतियों का है । aftaar aata के स्वामी भी वैयि काययोग की तरह देव और नारक होते हैं। अतः इस योग में भी देवगति के समान बन्ध होना चाहिए था। लेकिन इतनी विशेषता समझना चाहिए कि इस योग में आयु का बन्ध असंभव है। क्योंकि यह योग अपर्याप्त अवस्था में ही देवों तथा नारकों के होता है । देव तथा नारक पर्याप्त अवस्था में, अर्थात् छह महीने प्रमाण आलू शेष रहने पर ही परभव सम्बन्धी आयु का बन्ध करते हैं। इसलिये वैक्रियमिश्र काययोग में तिर्यंचा और मनुष्यायु के सिवाय बाकी को अन्य सब प्रकृतियों का are aक्रिय काययोग (देवगति) के समान समझाना चाहिए । वैकिय काययोग की अपेक्षा वैक्रियमित्र काययोग में एक और विशेषता समझनी चाहिए कि वैयि काययोग में पहले के चार गुणस्थान होते है, जबकि वैक्रियमिश्र काययोग में पहला, दूसरा और चौथा ये तीन गुणस्थान ही होते हैं। क्योंकि यह योग अपयप्ति अवस्था में होता है । इससे इसमें अधिक गुणस्थान होना १. नारक देवानामुपपातः । सूत्र २१३५ उत्पत्तिस्थान में स्थित त्रि पुगलों को पहले-पहल शरीर रूप में परिणत करना उपपात जन्म है। २. क्रियमोपपातिकम् । - तवार्य २/४७
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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