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________________ तृतीय कर्मग्रन्थ इस योग में और भी दो (पाँचां, छठा) गुणस्थान माने जाते हैं । इस सम्बन्ध में सिद्धान्त का मत है कि बैंक्रियलब्धि से बैंक्रिय शरीर का प्रारम्भ करने के समय अर्थात् पाँचवें, छठे गुणस्थान में और आहारकलब्धि से आहारक शरीर की रचना के समय अर्थात् छठे गुणस्थान में औदारिकमिश्र काययोग होता है।। इस मत की सूचना चौथे कर्मग्रन्थ की गाथा ४६ में की गई है.. सारपसावे नाणं विजयमाहारगे उरलमिस । गिदिस सामाणो नेहाभियं सुयमपं घि इसकी स्वोपज्ञ दीका में अन्धकार में स्पष्ट किया है ...- औदारिक शरीरवाला नैनियलम्विधारक मनुष्य, पंचेविदय लियच मा बादर पर्याप्त वायुकाय जिस समय चक्रिय शरीर रचता है, उस समय वह औदारिक शरीर में रहता हुआ अपने प्रदेशों को फैलाकर और बैंक्रिय शारीर-योग्य पुदगलों को लेकर जब तक बैंक्रिय शरीर पर्याप्ति को पूर्ण नहीं करता तब तक उसके औदारिक काययोग की वैकियारीर के साथ मित्रता है, परन्तु व्यवहार औदारिक को लेकर औदारिक-मिथता का करना चाहिए, क्योंकि उसी की प्रधानता है। इसी प्रकार आहारक शरीर करने के समय भी उसके साथ औदारिक काययोग की मिश्रता को जान लेना चाहिए। सिद्धान्त के उक्त कथन का आशय यह है कि बैंक्रिय और आहारक का प्रारम्भ काल में औदारिक के साथ मिश्रण होने से औदारिकमिश्र कहा है। बैंक्रियलब्धि, आहारकलब्धि सम्पन्न जब उक्त शरीर करता है तब औदारिक शरीरयोग में वर्तमान होता है। जब तक वैक्रिय शारीर या आहारक शरीर में शरीरपर्याप्ति पूर्ण न कर ले तब तक मिश्रता होती है। परन्तु औदारिक की मुख्यता होने से व्यपदेश औदारिकमिश्र का होता है । अर्थात् वैश्यि और आहारक करते समय लो औदारिकमिथ यह कहा जाता १. प्रमापना, पद १६, पत्र ३१६-१ (चतुर्थ कर्मणम्प वोपम टीका पृ. १२ पर सवत)
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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