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सुतीय कर्मग्रन्थ
समान ही देवों के सामान्य में बाध मानकर भी भरकगति की अवन्ध्य १६ प्रकृतियों में से एकेन्द्रियत्रिक का बन्ध होने से देवों के १०१ की बजाय १०४ प्रकृतियों का बन्ध माना जाता है।
इस प्रकार सामान्य से देवगति में जो १७४ प्रकृतियों का बन्ध बतलाया गया है, उसी प्रकार कल्पवासी देवों के पहले सोधर्म और दूसरे ईशान इन दो कल्पों तक समझना चाहिए।
सामान्य मे बन्धयोग्य १०४ प्रकृतियों में से देवगति तथा पूर्वोक्तः कल्पट्टिक के देवों के मिथ्यात्व गुणस्थान में तीर्थकरनामकर्म का बन्धन होने से १०३ प्रकृतियों का बन्ध होता है तथा शेष दूसरे, तीसरे और चौथे गुग्गस्थान में मरकगति के समान ही क्रमशः ६, ७० और १२ प्रकृतियों का बन्ध होता है ।
ज्योतिष्क, भवनवासी और व्यन्तर निकाय के देवों के तीर्थकर नामकर्म का बन्ध नहीं होने से सामान्य और पहले मिथ्यात्व गुणास्थान की अपेक्षा १०३ प्रकृतियों का बन्ध समझना चाहिए क्योंकि इन सीन निकायों के देव वहाँ से निकलकर तीर्थकर नहीं होते हैं और तीर्थकर नाम की सत्ता वाले जीव भवनपति, अन्तर और ज्योतिरुक देवनिकायों में उत्पन्न नहीं होते हैं तथा इन तीन निकायों के जीव अवधिशान सहित परभव में जाते नहीं और तीर्थकर अवधिज्ञान महित ही घरभक में जाकर उत्पन्न होते हैं । इसलिए इन तीन निकायों के देवों के तीर्थकर नामकर्म का बन्ध नहीं होता है ।
इसलिए ज्योतिष्क आदि तीन निकायों के देवों के सामान्य से और पहले गुणस्थान में १०३, दूसरे में ६६. तीसरे में ७० और चौथे में तीर्थक र नामकर्म का बन्ध न होने से ७२ की बजाय ७१ प्रकृतियों का बन्ध होता है। ___सारांश यह है कि देवमति में सामान्य की अपेक्षा नरकगलि के समान बन्ध होने का नियम होने पर भी एकेन्द्रियत्रिक का बन्ध अधिक होता है । इसलिए जैसे मरकमति में सामान्य र १०१