SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 66
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ स्वस्वामित्व विशेषार्थ-अब देवगति में सामान्य और गुणस्थानों की अपेक्षा बंधस्वामित्व बतलाते हैं । देवों के भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिष्क और कल्पवासी थे पार निकाय हैं और देवगति में भी नरकगति के समान पहले चार गुणस्थान होते हैं । अतः सामान्य से बंधस्वामित्व बतलाने के बाद चारों निकायों में गुणस्थानों की अपेक्षा बंधस्वामित्व का वर्णन किया जा रहा है। यद्यपि देवों को प्रकृतिबन्ध नारकों के प्रकृतिबन्ध के समान है। तथापि देवगति में एकेन्द्रियत्रिक-एकेन्द्रिय जाति, स्थावर नाम और आतप नाम-का भी वैध हो सकने से सामान्य बंधयोग्य व पहले मिथ्यात्व गुणस्थान में नरकगति की अपेक्षा बन्धयोग्य प्रकृतियों में कुछ विशेषता होती है। __'निरय ध्य सुरा' नारकों की तरह देवों के भी बन्ध कहने का मतलब यह है कि जैसे नारक मरकर नरकगलि और देवगति में उत्पन्न नहीं होते हैं, वैसे ही देव भी मरकर इन दोनों गतियों में उत्पन्न नहीं होते हैं। इसलिए देवनिक, नरकत्रिक और वैक्रियद्विक ...इन आठ प्रकृतियों का बन्ध्र नहीं करते हैं तथा सर्वदिस्त प्रथम के अभाव में आहारकद्विक का भी बंध नहीं करते हैं और देव मरकर सूक्ष्म एकेन्द्रिय तथा विकले न्द्रियों में भी उत्पन्न नहीं होते हैं, जिससे सूक्ष्मत्रिक और विकलेन्द्रियत्रिक इन छह प्रकृतियों का बन्ध नहीं करते हैं । इस प्रकार उक्त कुल १६ प्रकृतियाँ बन्धयोग १२० प्रकृतियों में से कम करने पर सामान्य मे १०४ प्रकृतियों का बन्ध होता है। नरकगति में जो बन्धयोग्य १२० प्रकृतियों में में सुरद्विक से लेकर आसप नामकर्म पर्यन्त १६ प्रकृतियों का बन्ध नहीं होने से १०१ प्रकृतियों का बन्ध कहा गया है, वहाँ एकेन्द्रियत्रिक--एकेन्द्रिय, स्थावर और आतप इन तीन प्रकृतियों को भी ग्रहण किया गया है। लेकिन देव मरकर बादर एकेन्द्रिय में उत्पन्न हो सकते हैं। अतएव नारकियों की अपेक्षा एकेन्द्रिय, स्थावर और आतप- इन तीन प्रकृतियों को देव अधिक बांधते हैं। इसलिए नरकगति के
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy