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________________ द्वितीय . गई सोलह प्रकृतियों को मिलाने से दूसरे गुणस्थान के अन्त समय में व्युच्छिन्न होने वाली कुल २५ प्रकृतियाँ हो जाती हैं। ___ ग्रन्थकार ने २५ प्रकृतियों में सेलीचगोत्र उद्योतनाम, अप्रशस्त विहायोगतिनाम और स्त्रीवेद, इन चार का तो अलग-अलग नामोल्लेख कर दिया है । और बाकी बची हुई २१ प्रकृतियों के नाम निम्नलिखित संज्ञाओं द्वारा बताये हैं - नरकनिक, स्त्यानद्धिविक, दुर्भगत्रिक, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, मध्यमसंस्थानचतुष्क, मध्यमसंहननचतुष्क । उक्त संज्ञाओं में ग्रहण को जाने वाली प्रकृतियों के नाम इस प्रकार हैंतियंचत्रिक ..तियंचगति, तिच-आनुपुर्वी, तिचर्य-आयु । स्त्यानद्धित्रिक -निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला, “त्यानद्धि । दुर्भगत्रिक - दुर्भगनाम, दु.स्वरनाम, अनादयनाम । अनन्तानुबन्धीचतुष्क-अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया. लोभ । मध्यमसंस्थानचतुष्क --न्यग्रोधपरिमण्डलमंस्थान, सादिसंस्थान, वामनसंस्थान, कुब्जसंस्थान । मध्यमसंहनन चतुष्क- ऋषभनाराचसंहनन, नाराचसंहनन, अर्धनाराचसंहनन, कीलिका संस्हन । पूर्वोक्त तिर्यंचत्रिक से लेकर स्त्रीवेद पर्यंत २५ कर्मप्रकृतियों का विच्छेद दूसरे गुणस्थान के अन्त में हो जाता है। अर्थात् आगे तीसरे, चौथे आदि गुणस्थानों में इनका बन्ध नहीं हो सकता है। इसका कारण यह कि तिर्यचत्रिक आदि २५ प्रकृतियों का बन्ध अनन्तानुबन्धीकषाय के उदय से होता है और अनन्तानुबन्धीकषाय का उदय सिर्फ पहले और इसरे गुणस्थान तक ही रहता है, तीसरे आदि आगे के गुणस्थान में नहीं। इसलिए दूसरे गुणस्थान की बन्धयोग्य १०१ प्रकृतियों में से
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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