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________________ ५८ तिर्यंचत्रिक आदि २५ प्रकृतियों को कम करने से तीसरे ७६ प्रकृतियाँ बन्धयोग्य मानी जानी चाहिए थीं । कर्मस्तव गुणस्थान में किन्तु तीसरे - मिश्र गुणस्थानवर्ती ( सम्यग्मिथ्यादृष्टिगुणस्थानवर्ती) जीव का स्वभाव ऐसा होता है कि उस समय उसका मरण नहीं होता है और न परभव सम्बन्धी आयु का बन्ध ही होता है ।" क्योंकि मिश्रगुणस्थान और मिश्र काययोग की स्थिति में आयुकर्म का बन्ध नहीं हो सकता है । इसलिए आयुकर्म के चार भेदों में से नरकायु का बन्ध पहले गुणस्थान तक और तिचायु का बन्ध दूसरे गुणस्थान तक होने से तथा 'दुआउ अबन्धा' बाकी की मनुष्यायु और देवायु इन दो आयु का तीसरे गुणस्थान में बन्ध न होने से नरकत्रिक आदि पूर्वोक्त २५ प्रकृतियों तथा मनुष्यायु एवं देवायु सहित कुल २७ प्रकृतियों को सासादन गुणस्थान की बन्धयोग्य १०१ प्रकृतियों में से कम करने पर शेष ७४ कमंप्रकृतियाँ तीसरे गुणस्थान में बन्धयोग्य हैं । अब आगे की गाथा में चौथे अविरतसम्यग्दृष्टि, पाँचवे देशविरत और छठे प्रमत्तसंयत गुणस्थान में बन्धयोग्य प्रकृतियों की संख्या और इनके नाम बतलाते हैं सम्मे सगरि जिणाउबन्धि, बद्दर नरतिग वियकसाय | उरलगन्तो बेसे बेसे, सत्सट्ठी तिअफसान्तो ||६|| गायार्थ - अविरतसम्यग्दृष्टि नामक चौथे गुणस्थान में जिन - तीर्थङ्कर नामकर्म और दो आयु का बन्ध होने से ७७ प्रकृतियों का बन्ध हो सकता है । वज्रऋषभनाराचसंहनन, मनुष्यत्रिक, अप्रत्याख्यानावरणकषायचतुष्क और औदारिकद्विक के बन्धविच्छेद होने से देशविरत नामक पाँचवें गुणस्थान १. सम्मामिच्छादिट्ठी आयबन्धं पि न करेइति । - इति अगमवचनात् 1. י
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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