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________________ द्वितीय कर्मग्रन्थ गुणस्थान में भी जीव को छद्म (ज्ञानावरण आदि धातीकर्म) तथा वीतरागत्व (राग के उदय का अभाव) होता है, परन्तु उपशान्तकषाय इस विशेषण से बारहवें गुणस्थान का बोध नहीं हो सकता। क्योंकि बारहवं गुणस्थान में जीव के कषाय उपशान्त नहीं होते हैं, अपितु क्षय हो जाते हैं। इसी तरह 'वीतराग' इस विशेषण के अभाव में उपशान्त-कषाय-छद्मस्थ गुणस्थान इतने नाम से चतुर्थ, पंचम आदि गुणस्थानों में भी जोव के अनन्तानुबन्धी कषाय उपशान्त हो सकने के कारण चतुर्थ, पंचम आदि गुणस्थानों का भी बोध होने लगता है। परन्तु वीतराग इस विशेषण के रहने से चतुर्थ, पंचम आदि गुणस्थानों का बोध नहीं हो सकता है। क्योंकि उन गुणस्थानों में वर्तमान जीव के राग (माया तथा लोभ) के उदय का सद्भाव ही होता है, अतएव वीतरागत्व असम्भव है। ___ ग्यारहवें गुणस्थान में विद्यमान जीव आगे के गुणस्थानों को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होता है; क्योंकि आगे के गुणस्थान वही पा सकता है, जो क्षपकथंणी को करता है और क्षपकश्रेणी के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है। परन्तु ग्यारहवें गुणस्थानवी जीव तो नियम से उपशमश्रेणी को करने वाला ही होता है। अतएव वह जीव ग्यारहवें गुणस्थान से अवश्य ही गिरता है। इस गुणस्थान का समय पूरा न होने पर जो जीव भव (आयु) के क्षय से गिरता है तो वह अनुत्तर विमान में देवरूप से उत्पन्न होता है और उस समय उस स्थान पर पांचौ आदि-आदि अन्य गुणस्थान सम्भव न होने से चौथे (अविरतसम्यग्दृष्टि) गुणस्थान को प्राप्त करता है और चौथे गुणस्थान को प्राप्त कर वह जीव उस गुणस्थान में उन सब प्रकृतियों के वन्ध, उदय, उदीरणा को प्रारम्भ कर देता है, जितनी कर्मप्रकृतियों के बन्ध, उदय, उदीरणा की सम्भावना
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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