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________________ कमस्तव छमस्थ हैं और उनके स्वरूप-विशेष को उपशान्त कषाय-वीतरागछद्मस्थ गुणस्थान कहते हैं। शरद ऋतु में होने वाले सरोवर के जल की तरह मोहनीयकर्म के उपशम से सस्ता होने वाले निमः पापा मुसाबाले जीव के होते हैं। आशय यह है कि मोहनीयकर्म की सत्ता तो है परन्तु उदय नहीं होता है। "उपशान्त-कषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान' इस नाम में (१) उपशान्त-कषाय, (२) वीतराग, (३) छद्मस्थ-ये तीन विशेषण' हैं। उनमें से 'छद्मस्थ' यह विशेषण स्वरूप-विशेषण है। क्योंकि उसके अभाव में भी 'उपशान्त-कषाय-वीतराग गुणस्थान' इतने नाम से ग्यारहवें गुणस्थान का बोध हो जाता है और इष्ट के अतिरिक्त दूसरे अर्थ का बोध नहीं होता है । अत: 'छद्मस्थ' यह विशेषण अपने विशेष्य के स्वरूप का बोध कराने वाला है । 'उपशान्त-कषाय' और 'वीतराग ये दो ब्यावर्तक-विशेषण हैं। इन दोनों के रहने से ही इष्ट अर्थ का बोध हो सकता है और इनके । न रहने पर इष्ट अर्थ का बोध न होकर अन्य अर्थ का भी बोध हो । जाता है । जैसे 'उपशान्त-कषाय' इस विशेषण के अभाव में 'वीतराग- । छमस्थ गुणस्थान' इतने नाम से इष्ट अर्थ (ग्यारहवें गुणस्थान) के सिवाय बारहवें गुणस्थान का भी बोध होने लगता है। क्योंकि बारहवे १. विशेषण दो प्रकार का होता है—(१) स्वरूप विशेषण, (२) व्यावर्तकविशेषण । स्वरूप-विशेषण-जिसके न रहने पर भी शेष भाग से इष्ट अर्थ का बोष होता है। अर्थात यह विशेषण अपने विशेष्य के स्वरूप मात्र को जताता है। व्यावर्तक-विशेषण—जिसके रहने से ही इष्ट अर्थ का बोध हो सकता है। उसके अभाव में इष्ट के सिवाय दूसरे अर्थ का भी । बोध होने लगता है।
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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