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________________ ३४ कर्मस्तव इस बात को अब विशेष रूप से स्पष्ट करते हैं गुणस्थान के अध्यवसायों के उतने ही वर्ग हो सकते हैं, जितने कि इस गुणस्थान के समय हैं। एक-एक वर्ग में चाहे त्रैकालिक अनन्त जीवों के अध्यवसायों की अनन्त व्यक्तियाँ शामिल हों. परन्तु प्रत्येक वर्ग के सभी अध्यवसाय शुद्धि में बराबर होने से उन-उन प्रत्येक वर्ग का अध्यवसाय स्थान एक ही है । लेकिन प्रथम समय के अध्यवसायस्थान से - प्रथम वर्गीय अध्यवसायों से दूसरे समय के अध्यवसायस्थान --- दूसरे वर्ग के अध्यवसाय - अनन्तगुण विशुद्ध होते हैं। इसी प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे आदि नौवें गुणस्थान के अन्तिम समय तक पूर्वपूर्व समय के अध्यवसाय स्थान से उत्तर-उत्तर समय के अध्यवसायस्थान अनन्तगुण विशुद्ध समझना चाहिए । - यद्यपि आठवें और नौवें गुणस्थानों में अध्यवसायों में विशुद्धि होती रहती है; फिर भी उन दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। जैसे कि आठवें गुणस्थान में सम-समयवर्ती त्रैकालिक अनन्त जीवों के अध्यवसाय शुद्धि के तरतमभाव से असंख्यात वर्गों में विभाजित किये जा सकते हैं, किन्तु नौवें गुणस्थान में सम-समयवर्ती कालिक अनन्त जीवों के अध्यवसायों का समान शुद्धि के कारण एक ही वर्ग होता है । पूर्व-पूर्व गुणस्थान की अपेक्षा उत्तर-उत्तर गुणस्थान में कषाय के अंश बहुत कम होते जाते हैं और कषायों की न्यूनता के अनुसार जीव के परिणामों की विशुद्धि बढ़ती जाती है। आठवें गुणस्थान की अपेक्षा नौवें गुणस्थान में विशुद्धि इतनी अधिक हो जाती है कि उसके अध्यवसायों की भिन्नताएँ आठवें गुणस्थान के अध्यवसायों की भिन्नताओं से बहुत कम हो जाती हैं । नीवें गुणस्थान को प्राप्त करने वाले जीव दो प्रकार के होते हैं(१) उपशमक और ( २ ) क्षपक | जो चारित्रमोहनीयकर्म का उप 1 1 U
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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