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________________ द्वितीय कमन्य को यथाप्रवृत्तिकरण कहते हैं। यथाप्रवृत्तिकरण वाला जीव रागद्वेष की मजबूत गाँठ तक पहुंच जाता है किन्तु उसे भेद नहीं सकता। इसको नन्धिदेशप्राप्ति कहते है। राग-द्वेष की यह गाँठ क्रमशः दृढ और गुड़ रेशमी गांठ के समान दुर्भेद्य है। यथाप्रवृत्तिकरण अभव्य औधों के भी हो सकता है : कमों की स्थिति कोड़ा कोड़ी सागरोपम के अन्दर करके वे जीव भी ग्रन्थिदेश को प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु उसे भेद नहीं सकते। भव्य जीव जिस परिणाम से राग-द्वेष की दुर्भद्य ग्रन्थि को तोड़कर लाँध जाता है, उस परिणाम को अपूर्वकरण कहते हैं। इस प्रकार का परिणाम जीव को बार-बार नहीं आता, कदाचित् ही आता है। इसलिए इसका नाम अपूर्वकरण है । यथाप्रवृत्तिकरण तो अभव्य जीवों को भी अनन्त बार आता है, किन्तु अपूर्वकरण भत्र्य जीवों को भी अधिक वार नहीं आता। ____ अपूर्वकरण द्वारा राग-द्वेष की गांठ टूटने पर जीव के परिणाम जब अधिक शुद्ध होते हैं, उस समय अनिवृत्तिकरण होता है । इस परिणाम को प्राप्त करने पर जीव सम्यत्रत्व प्राप्त किये बिना नहीं लौटता है । इसीलिए इसका नाम अनिवृत्तिकरण है । अनिवृत्तिकरण की स्थिति अन्तर्मुहर्त प्रमाण है । इस अनिवृत्तिकरण नामक परिणाम के समय वीर्य समुल्लाम अर्थात् सामथ्य भी पूर्व की अपेक्षा बढ़ जाती है। अनिवत्तिकरण की जो अन्तमुहर्त प्रमाण स्थिति बतलाई गई है, उस स्थिति का एक भाग शेष रहने पर अन्तरकरण की क्रिया शुरू होती है, अर्थात् अनिवृत्तिकरण के अन्तसमय में मिथ्यान्वमोहनीय के कर्मदलिकों को आगे-पीछे कर दिया जाता है। कुछ दलिकों को अनिवृत्तिकरण के अन्त तक उदय में आने वाले कर्म-दलिकों के साथ कर दिया जाता है और कुछ को अन्नमुहूर्त बीतने के बाद उदय में
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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