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________________ द्वित्तीय कर्मग्रन्य स्वभाव को छोड़ दें तो उनका अस्तित्व नहीं रहेगा और संख्या भी नियत नहीं रहेगी । ५ I यद्यपि यह तो निश्चित है कि कर्मों की मूल प्रकृतियां संक्रमण नहीं करती हैं, लेकिन उत्तरप्रकृतियों में भी कितनी ही ऐसी हैं, जो सजातीय होने पर भी परस्पर संक्रमण नहीं करती हैं, जैसे- दर्शनमोह और चारित्रमोह | ये दोनों मोहनीयकर्म की उत्तरप्रकृतियाँ हैं, किन्तु दर्शनमोह चारित्रमोह के रूप में अथवा चारित्रमोह दर्शनमोह के रूप में संक्रमण नहीं करता है। सी तरह अनुकर्म के उत्तों के बारे में भी समझना चाहिए कि नरकायु का तिर्यंचायु के रूप में अथवा किसी अन्य आयु के रूप में संक्रमण नहीं होता है । उदीरणा - उदयकाल प्राप्त हुए बिना ही आत्मा की सामर्थ्यविशेष से कर्मों को उदय में लाना उदीरणा है । अर्थात् अबाधाकाल व्यतीत हो चुकने पर भी जो कमंदलिक पीछे से उदय में आने वाले होते हैं, उनको प्रयत्न - विशेष से उदयावलिका में लाकर उदयप्राप्त दलिकों के साथ भोग लेना उदीरणा कहलाता है । सत्ता - बँधे हुए कर्म का अपने स्वरूप को न छोड़कर आत्मा के साथ लगे रहना सत्ता कहलाती है । जैसे कि मनुष्यगति और मनुष्यानुपूर्वी ये दो कर्म बँधे हों तो वे दोनों बन्ध होने के कारण अपने स्वरूप को प्राप्त हुए माने जाएँगे और जब तक दोनों अपने स्वरूप में स्थित रहेंगे, तब तक उनकी सत्ता मानी जायेगी । मिथ्यात्वमोहनीयकर्म बन्ध होने के कारण सत्तारूप होने पर भी उसमें से फल देने की शक्ति कम हो जाने से उसके अर्द्ध रस वाले और नोरसप्राय- ये दो विभाग और हो जाते हैं और उन दोनों के बन्ध न होने पर भी मिश्र मोहनीय और सम्यक्त्वमोहनीय की सत्ता मानी
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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