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कर्मस्तव
अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। कभी तो यह अवाधाकाल स्वाभाविक क्रम के अनुसार व्यतीत होता है और कभी कारण-विशेष बीर्य-विशेष के संयोग से शीन भी पुरा हो जाता है। अबाधाकाल के इस शीन पूर्ण होने को अपवर्तनाकरण' कहते हैं।
जिस प्रकार वीर्य-विशेष से पहले बंधे हए कमों की स्थिति व रस को घटाया जा सकता है, उसी प्रकार बीर्य-विशेष से कम अपने स्वरूप को छोड़कर अपने सजातीय स्वरूप में परिवर्तित करके भोमा जा सकता है । इस प्रकार वीर्य-विशेष से कर्म का अपनी ही दुसरी सजातीय कर्मप्रकृतिस्वरूप को प्राप्त कर लेना संक्रमण कहलाता है। ___ कर्मों की मूल प्रकृतियों का एक दसरे में संक्रमण नहीं होता है। किन्तु मूल कर्म के उत्तरभेदों में संक्रमण होता है और नहीं भी होता है । जैसे कि ज्ञानावरणकर्म मूल कर्मप्रकृति है और मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण आदि उत्तरप्रकृतियाँ हैं । इनमें से मतिज्ञानावरण. कर्म श्रुतज्ञानावरणकर्म के रूप में अथवा श्रुतज्ञानावरणकर्म मतिज्ञानावरण आदि के रूप में परिवर्तित हो जाता है। क्योंकि ये प्रकृतियाँ मूल कर्म ज्ञानावरण के उत्तरभेद होने से परस्पर सजातीय हैं और ज्ञान को ही आवृत करती हैं, किन्तु आत्मा के अन्य गुणों को आवृत करने की सामर्थ्य नहीं रखती हैं। अर्थात् ज्ञानावरण का दर्शनावरण के रूप में और दर्शनावरण का ज्ञानाबरणकर्म के रूप में परिवर्तन नहीं होता है। क्योंकि इन दोनों कमों का अलग-अलग स्वभाव है और ये अलग-अलग कार्य करने की क्षमता रखते हैं और अपने स्वभाव के अनुरूप ही कार्य कर मकते हैं, किन्तु अपने मूल स्वभाव को छोड़ने की शक्ति नहीं रखते हैं। यदि कर्मों की मूल प्रकृतियाँ अपने मूल १. जिस वीर्यविशेष मे पहले बंधे हुए कर्म की रिथति तथा रस घट जाते है,
उसको अपवर्तनाकरण कहते हैं।