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________________ द्वितीय कर्मग्रन्थ जीव मिथ्यात्व आदि रूप परिणाम करता रहता है। इस प्रकार ये दोनों परस्पर आश्रित हैं । उदय उदयकाल' आने पर शुभाशुभ फल का भोगना उदय कहलाता है । अर्थात् बाँधी गई कर्म की स्थिति के अनुसार अथवा अपवर्तना- उद्वर्तना आदि करणों से कम हुई अथवा बढ़ी हुई स्थिति के अनुसार यथासमय उदयावलिका में प्राप्त कर्म का वेदन होना उदय कहलाता है । बन्धनकाल में कर्म के कारणभूत काषायिक अध्यवसायों को तीव्रतामन्दता के अनुसार प्रत्येक कर्म में तीव्र-मन्द फल देने की शक्ति उत्पन्न होती है और तदनुसार उदयकाल आने पर कर्म-फल को भोगना पड़ता है यह फल देने की शक्ति स्वयं कर्म में निष्ठ होती है और उसी कर्म अनुसार फल देती है, दूसरे कर्म के स्वभाव अनुसार नहीं । - कर्म का वेदन बन्ध होते ही तत्काल नहीं होता है, किन्तु कुछ समय विशेष तक स्थिर रहने के बाद उसका वेदन होना प्रारम्भ होता है । इस स्थिर रहने के समय को अकाल' कहते हैं । जैसे वर्त - मान में पानी कितना भी उबल रहा हो, लेकिन उसमें पकने के लिए डाली गई वस्तु कुछ समय के लिए बर्तन के तले में बैठ जाती है और फिर उसके बाद उसका पकना प्रारम्भ होता है। इस प्रकार तले में बैठने की स्थिति और समय अबाधाकाल समझना चाहिए । लेकिन यह अवधाकाल सभी कर्मों का अपनी-अपनी स्थिति के १. अबाधाकाल व्यतीत हो चुकने पर जिस कर्म के फल का अनुभव होता है, उस समय को उदयकाल कहते हैं । २. बॅचे हुए कर्म का जितने समय तक आत्मा को शुभाशुभ फल का वेदन नहीं होता, उतने समय को अबाधाकाल कहते हैं ।
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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