SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 22
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २४ ) नहीं है । इसके अतिरिक्त एक व्यक्ति की कमवन्धादि सम्बन्धी योग्यता भी सदा एक-समान नहीं रहती है, क्योंकि प्रतिक्षण परिणामों और विचारों के बदलते रहने के कारण बन्धादि सम्बन्धी योग्यता भी प्रतिसमय परिवर्तित होती रहती है। अतएव अध्यात्मज्ञानियों ने संसारी जीवों के उनकी भाभ्यन्तर शुद्धिजन्य उत्क्रान्ति, अशुद्धि-जन्य अपक्रान्ति के आधार पर उनका वर्गीकरण किया। इस वर्गीकरण को शास्त्रीय परिभाषा में 'गुणस्थान क्रम' कहते है ।। गुणस्थान का यह क्रम ऐसा है कि जिससे उन विभागों में सभी संसारी जीवों का समावेश एवं बन्धादि सम्बन्धी उनको योन्यता को बताना सहज हो जाता है और एक जीव की योग्यता जो प्रतिसमय बदला करती है, उसका भी निदर्शन किसी न किसी विभाग द्वारा किया जा सकता है । इन गुणस्थानों का क्रम संसारी जीवों की आन्तरिक शुद्धि के तरलम भाव के मनोविश्लेषणात्मक परीक्षण द्वारा सिद्ध करके निवरित किया गया है । इससे यह बताना और समझना सरल हो जाता है कि अमुक प्रकार की आन्तरिक शुद्धि या अशुद्धि बाला जीव इतनी कर्मप्रकृतियों के बन्ध, उदय-उदीरणा और सत्ता का अनिकारी है। गुणस्थानों का संक्षेप में विवेचन गुणों (आत्मशक्तियों) के स्थानों को अर्थात् आत्मा के विकास की . क्रमिक अवस्थाओं को गुणस्थान कहते हैं। जैनदर्शन में 'गुणस्थान' यह एक पारिभाषिक शब्द है और उसका अर्थ आत्मशक्तियों के आविभर्भाव-उनके शुद्ध कार्य रूप में परिणत होते रहने की तर तम-भावापन्न अवस्था है। आत्मा का यथार्थ स्वरूप शुद्ध चेतना और पूर्ण आनन्दमय है, लेकिन जब तक उस पर तीन कर्मावरण छाया हुआ हो तब तक उसका
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy