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________________ ( २१ ) पड़े । कर्मों की आत्यन्तिक निवृत्तिस आत्मः सोया नालब्धि करके परम अवस्था को प्राप्त कर ले। लेकिन तत्त्वचिन्तन को भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं के कारण उनमें विभिन्नताएँ देखी जाती हैं । इनमें मुख्यतया तीन प्रकार देखे जाते हैं-(१) परमाणुवादी, (२) प्रधानवादी, और (३) परमाणुवादी होकर भी प्रधान की छाया वाला 1 इनमें परमाणुवादी मोक्ष-समर्थक होने पर भी प्रवर्तकधर्म के उतने विरोधी नहीं, जितने दूसरे और तीसरे प्रकार के विचारक हैं। यह पक्ष न्याय-वैशेषिक दर्शन के रूप में प्रसिद्ध हुआ। दूसरा पक्ष प्रधानवादी है। यह पक्ष आत्यन्तिक कर्मनिवृत्ति का समर्थक होने से प्रवर्तकधर्म को हेय बतलाता है। यह पश्न सांस्य-योग के नाम से प्रसिद्ध है। इसी क्री तत्त्वज्ञान की भूमिका के आधार पर वेदान्त-दर्शन और संन्यास मार्ग की प्रतिष्ठा हुई । तीसरा पक्ष प्रधान-छायापन परमाणुवादियों का है। यह पक्ष भी दूसरे पक्ष को तरह प्रवर्तकधर्म का आत्यन्तिक विरोधी है जो जैनदर्शन के नाम से विख्यात है। बौद्ध-दर्शन भी प्रवर्तकधर्म का विरोधी माना जाता है, लेकिन वह दूसरे और तीसरे पक्ष के मिश्रण का एक उत्तरवर्ती विकास कहलाता है। बौद्ध और सांख्यदर्शन में कर्मतत्त्व के बारे में कुछ विचार अवश्य किया गया है, लेकिन बाद में उन्होंने ध्यान मार्ग का अनुसरण करके उस पर ही अपनी चिन्तनधारा केन्द्रित कर ली। जिससे उनका दृष्टिकोण एकांगी बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि कर्मसाहित्य में उनकी देन नगण्य-सी रह गई और जो कुछ है भी, वह चिन्तन की विकसित करने में सहायक नहीं बनती है। लेकिन जैन-चिन्तकों ने अन्य-अन्य विषयों के चिन्तन की तरह कर्मतत्व के बारे में भी गहन
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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