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________________ ५५ F -२५१] कर्मप्रकृतिः [ २०५. करणस्य त्रयो भेदाः ] सच करणोऽवःप्रवृत्तकरणोऽपूर्वकरणोऽनिवृत्तिकरणश्चेति विधा। [ २०६. अधःप्रवृत्तकरणस्य काल: ] तत्राधःप्रवृत्तकरणकालोऽन्तर्मुहूर्तमात्रः ।।२७७७॥ [ २०७. अपूर्वकरणस्य काल: ] सतः संस्धेयगुणहीनोऽपूर्वकरणकालः ॥२७७॥ [ २०८. अनिवृत्तिकरणस्य काल: ] ततः संख्येषगुण होनोऽनिवृत्तिकरणकासः ॥२७॥ [ २०९. त्रयाणां करणानां काल: ] त्रितयं समुदितमप्यन्सर्मुहर्तकाल एवं । २०५. करण के तीन भेद वह करण अधःप्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरणके भेदसे तीन प्रकारका है। २०६. अधःप्रवृत्तकरणका काल अधःप्रवृत्तकरणका काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है । २०७. अपूर्वकरणका काल __उससे संख्यात गुणहोन अपूर्वकरणका काल है । २०८. अनिवृत्तिवरणका काल उससे संख्यात गुणहीन अनिवृत्तिकरणका काल है। २०९. तीनों करणोंका सम्मिलित काल सीनों करणोंका सम्मिलित काल भी अन्तर्मुहर्त हो है। ME - E
SR No.090237
Book TitleKarmaprakruti
Original Sutra AuthorAbhaynanda Acharya
AuthorGokulchandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size1010 KB
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