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श्री कल्याणमन्दिरस्तोत्र सार्थ ततो गत्वा गुरोरने, भारती-मुनि-पूजनं । कृत्वेलाशुद्धिकार्य च, क्रमेणागमकोविदः । सतोऽम्लानांच सामग्री,कृत्वा सद्गी: बुधोत्तमः ।।
पूजनं पार्श्वनाथस्य, कुन्मिन्त्र-पुरस्सरम् ।। एतस्पद्यसप्तकं पठित्वा स्वस्तिकस्योपरि पुष्पाञ्जल क्षिपेत् ।
== == भोपार्श्वनाथस्तवन
{ सोरा छन्द) पारस प्रभु को नांउ. सार मुघासम जगत में। मैं बाकी बलि जाउ. अजर अमर पद मूल यह ।।
हरिगीता छन्द ( २८ मात्रा } राजत उतंग प्रशोक तरुवर, पवन-प्रेरित थर- हरे । प्रभु निकट पाय प्रमोदनाटक, करत मानो मन हरै।। तस फूल गुग्छन भ्रमर गुंजत, यही तान सुहावनी। सो जयो पाय जिनेन्द्र पातक, हरन बग चूड़ामनी ।। निज मरन देखि अनंग उरप्यो,सरन ढूंढस जग फिरयो। कोई न राखे चोर प्रभु को, माय पुनि पायन गियो ।। यों हार, निज हथियार डारे, पुष्पवर्षा मिस भनी। सो जयो पार्वजिनेन्द्र पातक, हरन जग चूमनी ॥ प्रभु अग नील उतंगगिरि , वानिशुचिसरिता ढसी। सो भेदि भ्रम गजवंत पर्वत, ज्ञान-सागर में रली ।।