________________
भूमिका
हुए वहाँ बहुत आवश्यक हैं। अन्त में तीन गाथाओं के द्वारा सभी गुणस्थानों और मार्गणास्थानों के जीवों की क्षेत्रप्ररूपणा कर दी गई है। गुणस्थानों में क्षेत्रप्ररूपणा करने वाली गाथा के साथ षट्खण्डागम के सूत्रों की समानता देखिये
vxxsii
जीवसमास- गाथा
मिच्छा उ सव्वलोए असंभागे य संसया हुति । केवलि असंखभागे भागे व सव्वलोए वा । १७८ ।।
षट्खण्डागम सूत्र
ओघेण मिच्छाइट्ठी केवडि खेते ? सव्वलोगे ||२|| सासणसम्माइद्विप्पहुडि जाव अजोगिकेवलित्ति केवडि खेते? लोगस्स असंखेज्जदिभाए ।। ३ ।। सजोगिकेवली केवड खेत्ते ? लोगस्स असंखेज्जदिभाए, असंखज्जेसु वा भागेसु, सन्चलोगे वा ||४|| ( षट्खं० पृ० ८६-८८ )
"
स्पर्शनप्ररूपणा करते हुए जीवसमास में पहले स्वस्थान, समुद्घात और उपपादपद का निर्देश कर क्षेत्र और स्पर्शन का भेद बत्तलाया गया हैं। तत्पश्चात् किस द्रव्य का कितने क्षेत्र में अवगाह हैं, यह बतलाकर अनन्त आकाश के मध्यलोक का आकार सुप्रतिष्ठित संस्थान बताते हुए तीनों लोकों के पृथक् आकार बताकर उसकी लम्बाई-चौड़ाई बताई है। पुनः मध्यलोक के द्वीप समुद्रो के संस्थान - संनिवेश आदि को बताकर उर्ध्व और अधोलोक की क्षेत्र सम्बन्धी घटा-बढ़ा का वर्णन किया गया है। पुनः समुद्घात के सातों भेद बताकर किस गति में कितने समुद्घात होते हैं, यह बताया गया है। इस प्रकार सभी आवश्यक जानकारी देने के पश्चात् गुणस्थानों और मार्गणास्थानों के स्पर्शन की प्ररूपणा की गई हैं। गुणस्थानों की स्पर्शनप्ररूपणा जीवसमास में डेढ़ गाथा में कहीं गई हैं, जबकि षट्खण्डागम में वह ९ सूत्रों में वर्णित है। दोनों का मिलान कीजिए -...
जीवसमास-गाध्या
मिच्छेहिं सव्वलोओ सासण- मिस्सेहि अजय देसेहिं । पुट्ठा चउदसभागा बारस अट्ठट्ठ छच्चेव ।। १९५ ।। सेसेल संभागो फुसिओ लोगो सजोगिकेवलिहिं । षट्खण्डागम- सूत्र
ओघेण मिच्छादिड्डीहिं केवडियं खेत्तं फोसिद ? सव्वलोगो ।। २ ।। सारणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेतं फोसिदं ? लोगस्सा असंखेज्जदिभागो ।। ३ ।।