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परिमाण-द्वार अका सागरोपम
एएसिं पल्लाणं कोडाकोडी हवेज्ज दसगुणिया । सं सागरोवमस्स उ परिमाणं हवाइ एक्कस्स ।। १२७।।
गाथार्थ- उपर्युक्त पल्योपम को दस कोटा कोटि से गुणा करने पर उद्धार सागरोपम होता है। उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी काल एवं पुतल परावर्तन
दस सागरोवमाणं पुनाओ हुंति कोडि- कोडीओ।
ओसप्पिणीपमाणं तं घेवुस्सप्पिणीएवि ।। १२८।। उस्सप्पिणी अणंता पोग्गलपरियट्टओ मुणेयल्यो ।
तेऽणतातीयऽद्धा अणागयता अणंतगुणा ।।१२९।।
माथार्थ-ऐसे दस कोडा कोडी सागरोपम सम्पूर्ण होने पर एक अवसर्पिणी होती है, और इतने ही परिमाण वाली एक उत्सर्पिणी होती है।
ऐसी अनन्न नाणी-अवसणी लादीत होरे पर एक पुटलपरावर्तन काल होता है। ऐसे पुद्गल पश्वर्तन काल अतीत में अनन्त हो गये तथा अनागत में भी अनन्त होंगे।
विवेचन-उत्सर्पिणी-उत अर्थात उत्थान, उन्नति काल। जिसमें प्रत्येक पदार्थ का विकास हो वह उत्सर्पिणी काल है यथा- आयु, लम्बाई, पसली, आदि-आदि।
जिसमें इसके विपरीत स्थिति घटित होती है, वह अवसर्पिणी काल है। वर्तमान में हम अवसर्पिणी के पंचम आरे में जीवन यापन कर रहे हैं।
सुहुमेण ये अद्यासागरस्स माणेण सबजीवाणं।
कम्मठिई काठि भावठिई यावि नायव्या ।।१३०।।
गाथार्थ- सूक्ष्म अद्धा सागरोपम के परिमाण से समस्त जीवों की कर्म स्थिति, कायस्थिति तथा भवस्थिति जाननी चाहिये। विवेचन
कर्म स्थिति- नारकी, तिर्यच, मनुष्य और देवो की कर्म स्थिति क्या है? यह जानना कर्म स्थिति है। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय तथा अन्तराय की तीस कोटा-कोटी सागरोपम. नाम गोत्र की बीस कोटा कोटी सागरोपम, आयु कर्म की तैतीस सागरोपम तथा मोहनीय की सत्तर कोटा-कोटी सागरोपम की उत्कृष्ट स्थिति होती है।