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________________ ( तृतीय-सर्ग ) स्थिस्था व कतिविमा विनानि मुदितम्या ! समं विज्ञापयामास स्वसुरं गुण मन्दिरम् ॥ १ ।। कुमार जिनदत्त अपनी नवोढा परम सुन्दरी पत्नी के साथ मनोवाञ्छित भोग भोगता हुआ कुछ समय प्रपने ससुराल में ही रहा । कुछ दिनोपरान्त एक दिन उसने अपने श्वसुर से निवेदन किया कि यद्यपि मैं यहाँ अति प्रमुदित हूँ तो भी मेरे माता-पिता मेरी प्रतीक्षा में पलक पांवडे बिछाये बाट जोह रहे हैं । मतः हे गुणभूषण मुझे प्राज्ञा दें ॥ १ ॥ यथा तातायो माम मवागमन मञ्जसा । मृगयन्तोव तिष्ठन्ते ततः प्रेषय मां लघु ॥ २॥ मेरे परिजन मेरे प्रागमन की वेला खोज रहे हैं, इसलिए माप शीघ्र ही हमारी विदाई करने की कृपा करें ॥ २॥ अनुशातस्त तस्तेन स दुःखेन कम्पन । भरिणत्वेति यथा पुत्र विच्छेव स्तब कुः सहः ॥ ३ ॥ जवाई की विज्ञप्ति सुनकर वणिक् पति को दुस्सह कष्ट हुमा, फिर भी किसी प्रकार लौकिक व्यवहारानुसार वह कहने लगा--पापका वियोग अत्यन्त दुःसह है फिर भी जाना उचित है ।। ३॥ वत्वा परिकरं सर्व वासी यानादि संयुता।। पुत्री समपिता तस्मै श्री वत्स्यायेष गोमिनी ।। ४ ।। पुत्री को योग्य दास-दासी, सवारी, वस्त्राभूषणादि सहित उसे समर्पित किया। अर्थात् साक्षात् लक्ष्मी स्वरूप पुत्री दामाद को साथ देकर विदा किया ॥ ४॥ ततस्तमनु यातु मे वेलुः श्रेष्ठयादयो जनाः । मागत्य ते स्थिताः सर्वे बालोधान जिनालये ।। ५ ॥ तथा पुत्री को पहुँचाने के लिए सेठ-सेठानी, कुटुम्ब-परिवार जन भी चल पडे। नगर के बाहर उद्यान में सब लोग समन्वित हो गये। वहाँ शोभनीय जिनालय में सब समूह मानन्द से प्रविष्ट हुआ ।। ५॥ [ ५१
SR No.090230
Book TitleJindutta Charit
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorTonkwala, Mahendrakumar Shastri
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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